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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



हो जाऊं


डाॅ. कौशल किशोर श्रीवास्तव


वे जायें तो मैं अपने में खो जाऊं,
ख्वाब वायदा कर लें तो मैं सो जाऊं।

उनकी मंजिल तो मेरी मंजिल न थी,
गाना उनका है क्यों मैं उसको गाऊं।

मेरे मन में मेरी मंजिल रहती है,
तेरे रस्ते रख उन पर मैं क्यों जाऊं।

मेरे दिल में चांद सितारे रहते हैं,
क्यों दिन में जागूं शब में क्यों सो जाऊं।

जिस्म तुम्हारा रूह मेरी ये मसला है,
जिस्म बिछा दे तू, फकीर में हो जाऊं।
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