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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



बहुत है


डाॅ. कौशल किशोर श्रीवास्तव


बस याद करना इबादत को बहुत है,
न मानना ही मेरे बिखरने को बहुत है।

छैनी हथोड़ा हाथ में एक बुत को बनाने,
जो हाथ में तेरे हो तो डरने को बहुत है।

जाना समन्दर तक बहुत लम्बा है रास्ता,
सन्तोश गिरना याद में झरने को बहुत है।

खूबसूरती तु खुदा की धरती पे आ गई,
बस मुस्कुराना तेरे संवरने को बहुत है।

न पैर सीधे कर सका जिन्दा रहा जब तक,
मरने पे एक कब्र पसरने को बहुत है।
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