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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



सजाओ न बारात


डॉ० अनिल चड्डा


 
 
सजाओ न बारात अर्थी की मेरी,   
बची हैं अभी भी उसाँसे घनेरी।  
 
मिला जो मुझे था न छीनो जहाँ में,  
छुपी है मेरे दिल में चाह बहुतेरी 

कहा भी नहीं था जुबाँ ने हमारी,           
कहाँ से थे समझे वो बातें सपेरी।

गुलों से कहानी न खारों की पूछो,
रहे ज़ेरे-साया न खुशबू बिखेरी।  
 
‘अनिल’ ने हमेशा कही दिल की अपने,   
सुनी बात लेकिन किसी ने न मेरी। 

 

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