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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



गुमनाम रिश्ते


अमरेश सिंह भदोरिया


 
गुमनाम रिश्ते का भार ढो रहा हूँ ।
अपनी कामना का संसार ढो रहा हूँ ।
 
सुखद अनुभव का जो स्वप्न कभी देखा था ,
उस कीमती पल का इंतज़ार ढो रहा हूँ । 

सदियां गुजर गयीं हैं लब पर हंसी न लौटी ,
आँसुओं का अब तक उपहार ढो रहा हूँ ।

निकलने से ही पहले जो नीलाम हो गयी है ,
उस सुबह की परछाईं के अधिकार ढो रहा हूँ । 

खामोश है समंदर और हवा भी ठहर गयी है ,
किश्ती में "अमरेश" मैं पतवार ढो रहा हूँ । 
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