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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



जाड़ा आया


डॉ. प्रमोद सोनवानी ‘पुष्प’


  

सूरज भैया जल्दी आकर ,
जाड़ा दूर भगाना तुम ।
सर-सर,सर-सर हवा चल रही,
गरमी हमें दिलाना तुम ।।1।।
जाड़ा के इन दिनों में ,
दूर कहीं मत जाना तुम ।
पास हमारे रहकर भैया ,
जाड़ा दूर भगाना तुम ।।2।।
जाड़ा हमें कपाता थर-थर ,
उसे तनिक समझाना तुम ।
ठिठुरन में कांपे न कोई ,
जाड़ा दूर भगाना तुम ।।3।।

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