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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



"आलू-गोभी का वार्तालाप"


डॉ० अनिल चड्डा


 
 
आलू बोला गोभी से,
मुझसे तू न टकराना,
मैं हूँ सब्जियों का  राजा ,
मेरे रस्ते से हट जाना ।
 
बोली गोभी आलू से,
मैं हूँ सब्जियों की  रानी,
ग़र आयेगा मेरे रस्ते ,
याद तुझे आयेगी नानी ।
 
आलू बोला चल बड़बोली,
मुझसे बनें बहुत पकवान,
तुझसे बस सब्जी या पराँठे,
मुझ बिन नहीं तेरी पहचान ।
 
गोभी बोली मेरे पराँठे,
स्वाद भरे हों सबसे करारे,
तेरे पराँठे ढीले-ढाले,
बड़े यत्न से मुँह में डालें ।
 
आलू बोला सुन ऐ गोभी,
मुझको चाहे किचन की रानी,
हर पल मुझको साथ में रखते,
मम्मी, बेटी या हो नानी ।
 
उबले आलू, सूखे आलू,
आलू-टमाटर, मटर संग आलू,
दम आलू या मेथी-आलू,
व्रत में भी तुम खालो आलू ।
 
गर्मी में आलू, सर्दी में आलू,
हर कोई चाहे आलू पा लूँ,
हर सब्जी संग स्वाद नया है,
हर सब्जी संग चले है आलू ।
 
गोभी बोली जो तुझे खाये,
पीछे खाने के पछताए,
इसमें इतना स्टार्च भरा है,
झटपट सबकी शुगर बढ़ाये ।
 
गोभी से बोला फिर आलू,
पोल तेरी कुछ मैं भी खोलूँ,
जो तुझको ज्यादा खा जाये,
रोये, दर्द मैं कैसे झेलूँ ।
 
गोभी-आलू की ये लड़ाई,
खत्म नहीं होने को आई,
चाकू मम्मीजी ने उठाया,
काट के दोनो सब्जी बनाई ।
 
आलू गोभी की सब्जी ने,
हमको था ये सबक सिखाया,
आपस में लड़ने से बच्चो,
दूजे ने था फायदा उठाया ।
	 
 

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