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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



इन्सान की जरूरतें:आहार, आवास,
आवरण और आनंद तथा आदमी


लेखक: पद्मश्री डॉ.गुणवंतभाई शाह
अनुवाद: डॉ.रजनीकांत एस.शाह


ई.एम.वोकर की काव्य पंक्तियों में इन्सान की जरूरतें इस प्रकार अभिव्यक्त हुई हैं।

Human needs:
some food, some sun,
some work, some fun and someone!

ये पंक्तियाँ भा गईं। उसकी वजह उसमें रहा प्रासगुम्फन नहीं है। बहुत ही काम शब्दों में कथित हमारी जरूरतों का ऐसा सुन्दर बयान मिलना असंभव है। हमें विगत कई वर्षों से `बुनियादी’ आवश्यकताओं की बात करते वक्त तीन बाबतों का ही स्मरण दिलाया जाता रहा है। आहार,आवास और आवरण। इन तीन के साथ आनंद को बहुत काम लोगों ने जोड़ा होगा।

कवि खुराक के साथ सूर्यप्रकाश को भी जोड़ देते हैं,यह कितना वाजिब है! सूर्यप्रकाश के मिलने के साथ साथ खुली हवा,खुला आकाश अपनेआप मिल जाता है ना! सूर्यप्रकाश से विटामिन `डी’ मिलता है,यह तो ठीक ही है। उपरांत और बहुत कुछ मिलता है। एक तरह से देखें तो सूर्यप्रकाश भी `आहार’ ही है। तथापि उसमें आहार उपरांत `कुछ’ है, जो ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। इतना तो याद रखना ही पड़ेगा कि सूर्यप्रकाश मिले और रोटी न मिले तो बात जमती नहीं है भारत में ऐसे अनेक गरीब लोग हैं,जिन्हें सूर्यप्रकाश जितना चाहो मिल जाता है, पर रोटी नहीं मिलती है उपरांत सूर्यप्रकाश भी कैसा? बैशाखी दुपहरी का तीखा सूर्यप्रकाश? हेमंती भोर का उष्मित सूर्यप्रकाश? कवि के मन में यहाँ मनपसंद सूर्यप्रकाश की बात है। विवशतावश सेंका जाना पड़े ऐसे उग्र सूर्यप्रकाश की यह बात नहीं है। जख मारकर कभी इन्सान ऐसा सूर्यप्रकाश बर्दाश्त कर ले यह ठीक है। लेकिन ऐसे कष्टप्रद सूर्यप्रकाश की तारीफ करने की जरुरत भी नहीं है। `बैशाखी सूर्यप्रकाश अपने चरम पर हो’ तब वह सान पर काम करनेवाला कारीगर आवाज दे, यह यथार्थ भी है लेकिन समाज को ऐसी सच्चाइयों का संग्रह करने की आवश्यकता नहीं है। विवशता कभी कभी हकीकत का रूप लेती है। यह बात सही है,लेकिन तमन्ना तो उस यथार्थ को धक्का मारकर हटा देने की ही रहनी चाहिए।

इन्सान को करने के लिए कुछ काम तो चाहिए ही और यदि कोई काम नहीं रहा तो वह शिकार पर जायेगा। मनपसंद काम का मिल जाना तो नसीब की बात है। कवि ने यहाँ बड़ी दक्षता के साथ आनंद की आवश्यकता को जोड़ दिया हैं। समाजशास्त्री आनंद को खूब महत्ता प्रदान करते हैं। कहा जाता हैं कि यदि अमरीका में फूटबोल का खेल न हो तो हत्याओं की मात्रा बढ़ जाएगी। हमारे यहाँ यदि सिनेमा नही हो तो अपराध अवश्य बढ़ जायेंगे। अपराधों को रोकने का सही उपाय पुलिसदल का विस्तार करने में नहीं है अपितु उसका सच्चा उपाय स्वस्थ मनोरंजन केन्द्र निर्मित किये जाने में है। एक थियेटर कितने अपराध रोक सकता है,यह जानने के लिए संशोधन करना तनिक मुश्किल भी है। अत्र-तत्र मनोरंजन प्राप्ति के केंद्र खुलने चाहिए। चलचित्रों के उपरांत मनोरंजन के अन्य अनेक प्रकारों को विकसीत किया जा सकता है। आरोग्ययुक्त समाज के विकास के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ साथ आनंद प्राप्ति के केंद्र भी बनाये जाने चाहिए।

काव्य की अंतिम पंक्ति अत्यंत सार्थक है। आदमी को सबकुछ मिल जाये तथापि कोई कमी तो अनुभव होती ही है। आहार तो यथार्थ आवश्यकता है। काम भी यथार्थ जरुरत है। सूर्यप्रकाश और मनोरंजन जुड़ जाये तब यह वास्तविक जरुरत ज्यादा सुन्दर ढंग से संतुष्ट होती है। फिर क्या शेष रह जायेगा? उसके बाद `किसी की’ उपस्थिति की कमी महसूस होती है। जिस पर अपने प्रेम का अभिषेक किया जा सके ऐसा पात्र आदमी खोजता है। यह पात्र प्रियतमा या पत्नी ही हो,ऐसा अनिवार्य नहीं है। जहाँ मन को विश्रांति मिले ऐसा एक स्थानक इन्सान को चाहिए होता है। ऐसा स्थानक जहाँ वह हर तरह से अनावृत्त हो सके,चहुधार आंसु बहाकर रो सके, इच्छा हो तो बच्चे की भांति नाच सके और दिल खोलकर तकरार कर सके! ऐसा `कोई’ अर्थात दूसरा `आदमी’। यह दूसरा आदमी कौन? वह प्रियतम भी हो सकता है या फिर प्रियतमा भी हो सकती है। महात्मा गाँधी ने परस्त्री को बहन या माता के रूप में देखने की सलाह दी थी। यह बात मुझे वाजिब वाजिब नहीं लगती। अन्य विजातीय व्यक्ति अर्थात भाई,बहन,माता या पुत्र। क्या ऐसी कोई व्यक्ति गर्लफ्रेंड या बोयफ्रेंड नहीं हो सकता? अंग्रेजी में उसके लिए आत्मप्रिया(Soulmate) शब्द प्रयुक्त हुआ है। रिचर्ड बेक के उपन्यास `A Bridge Across Forever’ में उपन्यास नायक आत्मप्रिया की खोज में लम्बी भटकन शुरू करता है। आखिर में वह एरिझोन के रेगिस्तान में पहुंचकर आत्मप्रिया(Soulmate) को प्राप्त करता है। क्या यह आध्यात्मिक घटना नहीं है? महात्मा गाँधी ने ऐसे मधुर सम्बन्ध को पवित्र मानकर सम्मानित करने की उदारता दिखाई नहीं है। उसकी वजह मेरी समझ में नहीं आ रही। इस विषय में कृष्ण मुझे ज्यादा स्वीकार्य लगते हैं। जीवन में गोकुल का माधुर्य,सौंदर्य और साहचर्य का प्रकटन हो उसका आध्यात्मिक महत्त्व कम नहीं है।

जिसके जीवन में अतिप्रिय ऐसा `Someone’ ऐसा व्यक्ति अनुपस्थित हो, ऐसे व्यक्ति के दर्द का अहसास तो मात्र नि:श्वास को ही होता है। तब तो हमारी बुनियादी आवश्यकताएँ अर्थात आहार,आवास,आवरण और आनंद उपरांत कोई खास व्यक्ति है। हमारा समाज अर्थात अनमेल जोड़ों का कारखाना(कालखाना)। उस समाज में वफ़ादारी का बोलबाला इतना तो वाचाल होता है कि किसी विजातीय व्यक्ति के साथ सम्बन्ध को अनैतिक सम्बन्ध कहा जाता है। ऐसा अनैतिक सम्बन्ध पवित्र नहीं समझा जाता,निंदनीय समझा जाता है। यदि इस बात में कोई दम है तो समाज को कृष्ण को दशरथ को,कुंती को,राधा को,इंद्र को,अहिल्या को,तारा को,रविंद्रनाथ ठाकुर को,जे.कृष्णमूर्ति को,पंडित नेहरू को,सुभाषबाबु को,ठक्करबापा को,क.मा.मुंशी को,इंदिरा गांधी को,अमृता प्रीतम को,साहिर लुधियानवी को तथा अटलबिहारी वाजपेयी को और ऐसे अनगिनत स्त्री-पुरुषों को निंदनीय मानना पड़ेगा। श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था,` मैं अपरिणित हूँ लेकिन ब्रह्मचारी नहीं हूँ!’ ऐसे निखालिस इकरार को पवित्र समझाने की ताकत इस रुग्ण समाज में कब आएगी?

कृष्ण ने गीता में आसुरी संपत्ति की सूचि में दंभ को पहले क्रम पर रखा है। मेरा यह स्पष्ट मानना है कि हमारा समाज कृषिप्रधान या उद्योगप्रधान नहीं है परन्तु दंभप्रधान है। सर्वोदय के क्षेत्र में काम करनेवाले कई सन्निष्ठ सेवकों के गाढ़ परिचय में आने के बाद मुझे ऐसा कहने की गुस्ताखी करनी पडनी है कि लगभग ९० प्रतिशत सेवक मधुर विजातीय सम्बन्ध रखनेवाले थे। उनके नाम तो मैं प्रकट नहीं कर सकता, परन्तु उनके निजी प्रेम सम्बन्धों का विवरण किसी भी सयाने और परिपक्व आदमी को बता सकता हूँ। ऐसा एक नाम है आदरणीय मोरारिबापू। सदगत कनैयालाल मुंशी ने अपने नाटक `ब्रह्मचर्याश्रम’ में उपहास के रूप में प्रस्तुत किया है। ऐसे संबंधों की निंदा में मस्त रहनेवाला समाज एक विराट मेन्टल हॉस्पिटल हो जाता है। जिसमें कामवासना से पीड़ित आदमी अन्य की कामवासना की निंदा करता रहता है। यह एक ऐसा रोग है,जिसे बीमारी का स्टेटस प्राप्त नहीं होता।

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समझदारी:

पैसा आहार का भरोसा दे सकता है,
भूख का नहीं,
संबंधों का भरोसा दे सकता है
प्रेम का नहीं,
मकान का भरोसा दे सकता है
घर का नहीं,
बेडरूम का भरोसा दे सकता है
नींद का नहीं,
वैभव का भरोसा दे सकता है
आनंद का नहीं
दवाई का भरोसा दे सकता है
आरोग्य का नहीं,
-भरोसा अवश्य दे सकता है
समाधान नहीं!


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