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वर्ष: 2, अंक 27, दिसम्बर(द्वितीय), 2017



डॉ० रिक लिंडल द्वारा रचित अंग्रेजी पुस्तक 'The Purpose'
के हिंदी अनुवाद का अगला भाग
[.....पिछले अंक से] अध्याय 4
" ब्रह्माण्ड का विकास "


लेखक: डॉ० रिक लिंडल
अनुवादक: डॉ० अनिल चड्डा


“ब्रहमांड कैसे एक साथ जुड़ा हुआ है, मैं इसका एक उपमा के माध्यम से वर्णन करता हूँ. कल्पना करो कि ‘सभी कुछ जो है’, या ईश्वर, एक बहुत विशाल चेतन जीव है. जो कुछ भी है वह इस जीव के अंदर है, और, इसलिये, जो कुछ भी है उसकी चेतना. यह जीव आत्मनिर्भर है, और यह अपने अंदर एक तरह की ‘क्रिया’ की या ‘घटना’ की रचना करता है, यद्दपि यह प्रभु की इच्छा से होता है. यह क्रिया महीन कणों को, जिन्हें हम ‘चेतना इकाइयाँ’ कहते हैं, जो एक जीव में निर्माण के लिये मूल खंड हैं, को सक्रिय करता है.”


सारी वाणी, गतिविधि और व्यवहार चेतना का उतार-चढ़ाव है. सारा जीवन चेतना से उत्पन्न होता है, और निरंतर चेतना में रहता है. सारा ब्रहमांड चेतना की अभिव्यक्ति है. ब्रहमांड की वास्तविकता यह है कि यह चेतना का एक असीम समुन्द्र है, जो गतिवान है.
महर्षि महेश योगी

“ठीक है, मुझे याद है कि आपने मुझे जो गृहकार्य हमारी पहली बैठक के बाद दिया था उसमें आपने चेतना इकाइयों के बारे में कुछ बताया था.”

“हां.....और आज मैं उन अवधारणाओं को, जो मैंने तुम्हे तब बताई थी, विस्तार से बताऊँगा. “जब क्रिया इन चेतना इकाईयों को सक्रिय कर देती है, तो वह अपनी विशिष्टता के अनुसार जुड़नी शुरू हो जाती हैं. तो, उदाहरणार्थ, जब ब्रहमांड की रचना हुई थी, चेतनाओं के एक विशिष्ट समूह ने संगठित हो कर आयाम बनाये थे. उन्होंने भौतिक आयाम और अध्यात्मिक आयाम रचित किये. इसके अतिरिक्त, दूसरी चेतना इकाईयों ने इन आयामों के अंदर आयाम रचित किये, जैसे कि तुम्हारे भौतिक आयाम के भीतर स्थान और समय के आयाम.”

जो कुछ भी मौजूद है
उसमें चेतना है.

रिक्की ने सोचते हुए कहा, “ठीक है, मुझे तुम्हारी बात समझ में आ रही है.”

“इन आयामों के बाहर भी चेतना इकाईयाँ थी जिन्होंने संगठित हो कर एक सामान्य मंच या एक ‘कैनवास’ बनाते हैं. सारे दिमागी और भौतिक ढाँचे जो प्रकट होते हैं, अध्यात्मिक इकाई या भौतिक इकाई में, इस कैनवास से बनते हैं. बेशक, तुम्हारे दृष्टिकोण से यह कैनवास अदृश्य है; यह पृष्ठभूमि में है. तुम केवल उन्ही ढांचों को देखते हो जो तुम्हारे भौतिक ब्रहमांड में प्रकट होते हैं. उदाहरणों में आकाशगंगा, तारे, तुम्हारी सौर-प्रणाली और ग्रहों के साथ-साथ धरती पर सभी कुछ, समताप मंडल, जीव मंडल, और ग्रह पर सभी भौतिक ढाँचे आते हैं, पहाड़ों, पानी, वनस्पति और पशुओं के सहित.”

“कैनवास में रची गई घटनाएं एक ऐसी प्रक्रिया की सहायता से, जिसे मैं ‘सामंजस्य का विकास’ कहूँगा, तुम्हारे भौतिक आयाम में प्रकट होती हैं. सामंजस्य का विकास एक निरंतर प्रक्रिया है जो घटनाओं को समय के आयाम में प्रकट करती हैं. यह उन वृत्ताकार सार्वभौमिक स्वरूपों का समन्वय करने के लिये जिम्मेदार हैं जो तुम्हारे भौतिक आयाम में होते हैं, क्योंकि यह उन ढांचों को प्रकट करता है जो कैनवास में रचे जाते हैं और उन्हें भौतिक आयाम में समय के अनुसार उत्तम सामंजस्य और उत्तम समकालिकता से प्रकट करता है. यदि सामंजस्य का विकास और समय का आयाम नहीं होता, तो तुम्हारे भौतिक आयाम में हरेक चीज एकदम से होती हुई प्रतीत होती.”

“ठीक है, मेरे विचार से मैं समझता हूँ. एक अदृश्य कैनवास ढाँचे रचता है, और सामंजस्य का विकास उन्हें मेरे भौतिक संसार में समय के आयाम में ले कर आता है.”

“ठीक है. उदहारण के लिये, तुम वह मिसाल देखते हो जिसमें चट्टानें बनती हैं और लाखों वर्षों के समय के अन्तराल में नष्ट हो जाती हैं. उसी तरह से, लेकिन समय के छोटे पैमाने पर, अधिक जटिल ढाँचे विकसित होते हैं, जैसे कि जीवन के स्वरूप जिनके विकास की शैली भी वृत्ताकार है, जिसे साधारणतया जीवनकाल कहा जाता है. यह जीवन स्वरूप जटिलतम होते जाते हैं, जैसे जैसे वह वनस्पति से पशुवर्ग में विकसित होते, जिसमें स्तनधारी और मनुष्य शामिल होते हैं.”

“ठीक है, मैं समझता हूँ.”

“अब, कार्य की इस स्थिति पर मनुष्य जानवर ही रहेगा, यदि आत्मा नहीं होती तो. आत्मा के साथ मिलने से मनुष्य संवेदनशील या आत्म-जागरूक हो जाता है.”

“मैं समझ गया. मुझे आत्मा के भ्रूण में मिलने की तुम्हारी पहले वाली टिप्पणी याद है.”

“हाँ...मैंने तुम्हे जो गृहकार्य हमारी पिछली मुलाक़ात में दिया था उसमें इस ओर इशारा किया था. ऊपरी आत्माएं, भौतिक संसार में अपने बारे में जानने के मौके का लाभ उठाते हुए, अपनी आत्माओं को गर्भावस्था में मनुष्य के भ्रूण की चेतना में डालते हैं. जैसे ही यह होता है, जानवर मनुष्य संवेदनशील और आत्म-जागरूक हो जाता है.”

रिक्की ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, “अच्छा, यह एक राहत है. मैं जानवर से अधिक विकसित हूँ.” वह सोचते हुए थोडा रुका. “लेकिन वह अविश्वसनीय है!”

पुरानी आत्मा ने अपने विचार को फिर से व्यवथित किया और कहा,”हाँ, इसे ही कुछ लोग चमत्कार कहते हैं. जब हम अवतरित होते हैं तो हम इस तरह से आत्मा की भान्ति भौतिक संसार में प्रवेश करते हैं.”

“मुझे वह पसंद है.”

“हाँ, और भाग्य से ऐसी ऊपरी आत्माओं की कोई कमी नहीं है जो अपनी आत्माओं को धरती पर भौतिक आयाम में जीवनकाल का अनुभव लेने के लिये भेजने को उत्सुक हैं. इसलिये, फलस्वरूप, सभी मनुष्य संवेदनशील हैं.”

“ठीक है, मैं समझता हूँ. यद्दपि, जल्दी से मेरा एक सवाल है. आपने एक बार कहा था कि आपने दर्जनों पिछले जीवन जीये हैं. क्या मैं एक ऐसी आत्मा हूँ जो बार-बार जन्म लेती है?”

“तुम्हारी ऊपरी आत्मा ने पिछले कुछ सैंकड़ों वर्षों में धरती पर कई आत्माएं भेजी हैं लेकिन कभी भी पूरी तरह से वही आत्मा नहीं होती जो पुनर्जन्म लेती है. तुम्हारी आत्मा प्रत्येक पुनर्जन्म के लिये अलग आत्मा तैयार करती है.42 प्रत्येक आत्मा में ऊपरी आत्मा के कई गुण होते हैं, जिसमें तुम्हारी ऊपरी आत्मा की आत्माओं के पिछले जन्म के अनुभव होते हैं. और, जैसा कि मैंने पहले बताया था, तुम्हारी ऊपरी आत्मा ने जिन आत्माओं को जन्म दिया है उनमें समानताएं होती हैं. यह समानताएं व्यक्ति के चरित्र और चेहरे के भाव दोनों में ही दिखाई देती हैं. वास्तव में, यदि तुम हाल ही के अपने पूर्व जन्म की फोटो या चित्र को ढूँढ़ पाओ, तो तुम अपने वर्तमान जीवन के चेहरे की दिखावट में अद्भुत समानता पाओगे.”

रिक्की ने चिल्ला कर कहा,”वाओ! वह बड़ा दिलचस्प होगा.”

“पिछले जन्म के अनसुलझे मुद्दे भी अक्सर नई आत्मा में सम्मिलित होते हैं, नई आत्मा को उन मुद्दों पर आगे काम करने का अवसर देने के लिये. एक उदहारण जो तुमसे संम्बंध रखता है वह तुम्हारा पानी से डर था. यह डर बहुत पहले पैदा हुआ था, लेकिन अनसुलझा ही रहा. इसलिये तुमने इसे वर्तमान जीवन में लाने का फैसला किया, और अब यह सुलझ गया. विशिष्ट प्रतिभाएं भी अक्सर आगे के विकास के लिये साथ में लाई जाती हैं.”

“आपका मतलब है एक विलक्षण बच्चे की तरह?”

“हाँ. ऊपरी आत्मा एक विशिष्ट क्षमता को भी, जो पूर्व जन्म में, या लगातार पिछले कई जन्मों में, विकसित हुई थी, उसके साथ आगे काम करने के लिये अपने साथ ले कर आ सकती हैं.

“प्रत्येक जन्म की शुरुआत एक नवजात शिशु और एक नई आत्मा से होती है – या अधिक सही रूप में, एक नई नई संशोधित आत्मा के द्वारा. नई आत्मा तैयार करने में, तुम व्यक्तित्व की कुछ महत्वपूर्ण विशेषताएं भी बनाते हो जो तुम्हारे अनुमान से उन नियत घटनाओं की, जो आपने नियोजित की हैं, आवश्कताओं को पूरा कर पायेंगी, ताकि आपको अपनी आंतरिक प्रकृति के बारे में अंतर्दृष्टि मिले. जैसे-जैसे ऊपरी आत्मा एक के बाद एक जन्म चक्र में अपने बारे में जानती है, वह परिपक्व होती है और आध्यात्मिक रूप से विकसित होती है. तुम्हे यह भी जानना चाहिये कि प्रत्येक आत्मा, जिसे तुम्हारी ऊपरी आत्मा ने धरती पर भेजा है, जन्म के बाद अपनी पहचान बनाये रखती है, और जब तुम्हारा जीवनकाल समाप्त हो जाता है और तुम अध्यात्मिक आयाम में वापिस आ जाते हो, तो तुम इसकी यादों और भावुक अनुभवों तक पहुँच सकते हो. यदि तुम चाहो तो, तुम वर्तमान जीवन में उन पूर्व जन्मों तक भी पहुँच सकते हो, पूर्व-जन्म में वापिसी के दौरान.”

“ठीक है. उससे यह स्पष्ट हो जाता है.

“इससे पहले कि हम आगे बढ़ें, एक और बात है जो थोड़ा अच्छे ढंग से मैं समझना चाहूँगा, यदि मैं समझ सकता हूँ तो?”

“बेशक.....तुम्हारे दिमाग में क्या है?”

“हमारी पहली मुलाकात के बाद, तुमने जो गृहकार्य मुझे दिया था उसमें कहा था कि धरती पर जीवन मुख्यतः ‘आंतरिक शिक्षा’ के बारे में है जो तब होता है जब हम भावुक अनुभव बनाते हैं. बाकि उन सब चीजों के बारे में क्या होता है जो हमारे जीवनकाल में होती हैं जो विशेषतया भावुकता के बारे में नहीं है? क्या वह भी महत्वपूर्ण नहीं है?”

पुरानी आत्मा हिचकिचाई, “वह एक अच्छा प्रश्न है. यह हमें कुछ मिनटों के लिये विषय से भटका देगा, लेकिन मैं सोचता हूँ कि यदि मैं आगे बढ़ने से पहले संक्षिप्त उत्तर दूँ तो यह हमारी सहायता करेगा.

“धरती पर सामान्य दृष्टिकोण यह है कि जीवन मुख्यतः गतिविधियों के माध्यम से उपलब्धियों और सफलताओं के बारे में है, , जैसे कि काम, लेकिन दरअसल वैसा नहीं है. जैसा कि मैंने पहले कहा था, तुम्हारे अवतरण का मुख्य कारण भावनाओं का अनुभव करना है जो यहाँ अध्यात्मिक आयाम में उत्पन्न होती है और आंतरिक शिक्षाओं से लाभ उठाना जब तुम उन्हें प्राप्त करते हो. तुम्हारे जीवनकाल में बाकी सभी घटनाएं मुख्यतः इन भावनात्मक अनुभवों को प्राप्त करने के लिये एक वाहन हैं.”

“क्या तुम्हारा यह मतलब है कि बाकी सब कुछ जो लोग अपने जीवन में करते हैं, जैसे कि पढ़ना, जीविका के लिये प्रयास करना, काम करना, पैसा बनाना, इत्यादि, महत्वपूर्ण नहीं है?”

“नहीं, यह कार्य करना भी अनिवार्य है. यह एक व्यक्ति के सारे जीवनकाल के दौरान संतुष्टि, उद्देश्य, और अर्थ देते हैं, और इसके बारे में मैं तुम्हे बाद में और बताऊंगा. लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण ये है कि यह कार्य उस सन्दर्भ की रचना करने में सहायता करते हैं जिनमें भावनात्मक अनुभव घटित होते हैं. इन कार्यों के द्वारा, लोग अपने आपको जीवन की भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में पाते हैं, जिनमें उनका मानसिक चरित्र, जब स्थिति की विशिष्टता से जोड़ा जाये, तो एक विशेष भावुक अनुभव घटित होने के लिये बीज प्रदान करता है.”

रिक्की ने विचारपूर्वक पूछा, “क्या जीवन भावनाओं के निर्माण के लिये ही होता है?”

“हाँ, संक्षेप में, ऐसा ही है. विशिष्ट ‘चेतना इकाइयाँ’ संगठित हो कर एक ‘अनुभूति की स्थिति’ बनाती है जो सभी भावनाओं का आधार है. आपका सचेत प्रयोजन फिर इस अनुभूति की स्थिति को निर्मित करता है, इसकी तीव्रता बढ़ाते हुए. और अंत में, एक तरफ तो, यह तुम्हारी सचेत मंशा का, और दूसरी तरफ तुम्हारे मानसिक चरित्र और जीवन की विशेष परिस्थिति का, जो तुम्हारी भावना को परिभाषित करती है – या इस एक नाम देती है, सम्मिश्रण है. उदाहरणार्थ, यदि आपको एक लिफ्ट पर जाते हुए बहुत तीव्र डर का अनुभव होता है, तो आप, अपने मानसिक चरित्र के अनुरूप, एक ‘लिफ्ट का डर’ विकसित कर लेंगें.

“एक बार एक भावना उत्पन्न हो जाती है तो यह अक्सर दूसरी समान परिस्थितियों के लिये आम हो जाती है. उदाहरणार्थ, जिस व्यक्ति को लिफ्ट के डर और ऊंचाई के डर का अनुभव होता है, तो उसे सभी बंद जगहों, और ऊंचाई की सारी स्थितियों से भी डर लगने लगता है. सामान्यीकरण की यह विशेषता विशेष रूप से नकारात्मक भावनाओं के साथ समस्यात्मक होती है, जिसमें उदाहरणार्थ, डर, घबराहट, जलन, क्रोध, अवसाद, और दोष भी सम्मिलित हैं – क्योंकि यह उनके एक कोहरे की तरह फैलने का कारण होता है. यह कोहरा जैसे जैसे जमता जाता है, समान पारिस्थितियों के एक सुम्पूर्ण क्षेत्र पर धुंध की चादर ओढ़ देता है और व्यक्ति के चित्त में बैठ जाता है, कभी-कभी कई दिनों, हफ़्तों, और महीनों के लिये. यह एक ही तरह का सामान्यकरण सकारात्मक भावनाओं में भी होता है, जहां, उदाहरणार्थ, एक आनन्दमयी घटना के उपरान्त, प्रेम, आनन्द, और ख़ुशी धूप की उदात्त किरणों में स्नान कराते हैं – अक्सर बहुत लम्बे समय के लिये. हालांकि, तुम्हे यह जान कर सांत्वना मिलेगी कि समय के साथ-साथ, सारी घटनाओं के लिये जिनमें नकारात्मक और पीड़ादायक भावनाएं होती हैं, प्रेम (जो आत्मा की मौलिक प्रकृति होती है) का हाथ ऊपर हो जाता है, जिससे नकारात्मक भावनाएं लुप्त हो जाती हैं, जैसे कि सूर्य की किरणें कोहरे की चादर को तोड़ देती हैं.”

रिक्की, जो भावनाओं और बुद्धि के सम्बन्ध को अच्छी तरह से समझना चाह रहा था, ने पूछा,” लेकिन, बुद्धिमानी और बुद्धि-विषयक कार्यों के बारे में क्या स्थिति है? निश्चित ही, धरती पर जीवन भावनाओं की परवर्तनशीलता के मुकाबले बुद्धिमानी पर निर्भर करनी चाहिये?”

“एक अवतरण आत्मा की बुद्धिमानी को बढ़ाने के लिये नहीं लिया जाता. ऊपरी आत्माओं और आत्माओं की बौद्धिक क्षमता उससे कहीं बहुत अधिक है जो मानव शरीर के माध्यम से अवतरण के दौरान अभिव्यक्त की जाती है. इसलिये (और मैं इसके बारे में बाद में और बताऊँगा) तुम्हे यह स्वीकार करना चाहिए कि प्रत्येक मनुष्य समान रूप से मान्य है. उस आत्मा में, जो किसी उस व्यक्ति के शरीर में सम्मिलित हो जाती है जो मानसिक रूप से बीमार है, जो पढता-लिखता नहीं है, जो “लफंगा” है, या एक कूड़ा उठाने वाला है, और उन व्यक्तियों की आत्माओं में, जो समाज के सबसे सफल व्यक्ति माने जाते हैं, जैसे नोबल पुरस्कार विजेता और देशों के प्रमुख, कोई अंतर नहीं है जहाँ तक बुद्धिमानी का प्रश्न है.”

“मुझे समझ में नहीं आया. जैसा कि मैं देखता हूँ, इन व्यक्तियों के बीच बहुत बड़ा अंतर है.”

“हाँ है, लेकिन इन आत्माओं की बौद्धिक क्षमताओं में कोई अंतर नहीं है, लेकिन इसके बजाय सोच-विचार कर बने हुए नमूने में है जब आत्मा गर्भावस्था में भ्रूण के साथ सम्मिलित हो रही होती है. आत्मा, ऐसी परिस्थितियों के अनुभव की इच्छुक होते हुए जो उसे एक ख़ास तरह के गुण वाली भावना की ओर ले जायेंगीं, ऐसे सांस्कृतिक और जनसांख्यिक विन्यास को चुनती है जिसमें यह अवतरित होंगी, और भ्रूण को एक ऐसी मानसिक क्षमता, एक ऐसा चरित्र, देती है, जो उसे अवतरण के दौरान विशिष्ट कार्यों की ओर ले जायेगी, या वहीँ तक सीमित रखेगी. इस तरह से आत्मा विशेष प्रकार के भावनात्मक अनुभव के लिये एक सर्वोत्तम सन्दर्भ को रचने की कोशिश करती है.

“ऊपरी आत्मा और आत्मा के दृष्टिकोण से, एक अवतरण के दौरान के कार्य मुख्यतः ऐसी स्थितियों को लाने के लिये बनाये जाते हैं जो एक विशेष तरह की भावना को अनुभव करने का मौका देते हैं. बौद्धिक कार्य, और क्षमताएं जो एक जीवनकाल के दौरान प्रखर होती हैं वह भी महत्वपूर्ण होती हैं, लेकिन वह गौण होती है और आत्मा के अवतरण का मुख्य लक्ष्य नहीं होती.”

रिक्की थोड़ा नरम पड़ गया और बोला, “ठीक, मैं समझता हूँ तुम्हारा क्या मतलब है. लेकिन तब क्या होता है जब भावनाएं काबू के बाहर हो जाती हैं? क्या आप सोचते हैं कि धरती पर मनुष्य जाति को स्वयं को नष्ट होने से बचने के लिये समुचित बुद्धि है?”

पुरानी आत्मा मुस्कराई, “हाँ, है.”

अपनी टिप्पणियों को संक्षिप्त करते हुए, पुरानी आत्मा ने जारी रखा, “सारी आत्माएं जो धरती पर अवतरित होती हैं, कुछ आध्यामिक मार्गदर्शकों के अलावा, भावनाओं के बारे में सीखने के लिये ऐसा करती हैं. एक अवतरण के दौरान अंतिम चुनौती यह है कि आप अपना जीवन प्रेम की भावना के साथ जीयें(जो तुम्हारी आत्मा की प्रकृति का प्रतिबिम्ब है), जबकि साथ ही साथ घटनेवाली वाली सारी पीड़ादायक और नकारात्मक भावनाओं के बारे में अनुभव करें और सीखें. यह वह तरीका है जिससे आप इन भावनाओं को तब नियंत्रित करते हैं जब वह तीव्र और दबाने वाली हों, और उस समय जो फैसले आप करते हैं, उनसे से आपको अपनी आंतरिक प्रकृति के बारे में पता लगता हैं. अंततः, जब आप सीख लेते हैं कि इन भावनाओं से ऊपर कैसे उठना है, आप आध्यात्मिक तौर पर विकसित हो जाते हैं."

“मैं तुम्हे इस बारे में बाद में बताऊंगा कि आंतरिक शिक्षा कैसे होती है, जैसे-जैसे हम अपनी चर्चा जारी रखेगें. लेकिन, इस समय आओ हम अपने विषय पर वापिस चलते हैं.”

रिक्की बीच में बोला, “ठीक है, इन मुद्दों को स्पष्ट करने के लिये धन्यवाद.”

“जैसा कि मैं कह रहा था, बुनियादी जीवविज्ञान, जो मानव शरीर की बनावट पर प्रभाव डालता है, के अतिरिक्त यह आत्मा की जिम्मेदारी होती है कि मनुष्य को विशिष्ट और आत्म-जागरूक बनाये. यह आत्मा की चेतना और मानव शरीर की चेतना के सम्मिश्रण से होता है कि एक संवेदनशील मनुष्य की रचना होती है. संवेदनशील मनुष्य, वास्तव में, दो तरह की चेतनाओं से बनता है – वह आंशिक रूप से जटिल आत्मा की चेतना और आंशिक रूप से प्रारंभिक चेतना, जो कैनवास के अंदर की विशिष्ट चेतनात्मक इकाइयों से, जो भौतिक ब्रहमांड में सभी कुछ रचित करती हैं, से बनता है.

“ठीक है, मैं समझ गया.”

“तो, यह शरीर और आत्मा का सम्मिश्रण है जो मनुष्य को संवेदनशील या आत्म-जागरूक बनाता है. शरीर व्यक्तिगत कैमरे की भान्ति है, जिसके माध्यम से तुम भौतिक संसार का अनुभव कर सकते हो, और एक वाहन की भान्ति भी है, जिसे तुम ग्रह पर अपने जीवनकाल में इधर-उधर जाने के लिये प्रयोग करते है. शरीर के इस उपकरण के कुछ दिलचस्प गुण है और इनके लगातार रखरखाव की आवश्यकता होती है. यह महत्वपूर्ण है कि इनमें से कुछ का वर्णन तुम्हे संक्षेप में दूँ, इससे पहले कि हम आगे बढ़ें.”

“ठीक है. आपने शरीर का वर्णन एक कैमरे और एक कार की भांति किया है.”

“हाँ, यह एक अच्छी उपमा है, क्या तुम ऐसा नहीं सोचते? और पिछले जन्मों में तुम्हारे पास अलग-अलग कारें थीं, उनमें से प्रत्येक थोड़ा अलग ढंग से संचालित होती थी, क्योंकि दो भौतिक शरीर बिल्कुल एक समान नहीं होते.”


42 सेठ, जेन रोबर्ट्स के माध्यम से ऊपरी आत्मा के लिये अनगिनित सन्दर्भ देता है (उदहारण के लिये देखें, जेन रोबर्ट्स. द नेचर ऑफ़ पर्सनल रियलिटी, पृष्ठ 170, 1974. मनोवैज्ञानिक एफ.डब्ल्यू.म्येर्स (1843-1901) ने भी गेराल्दिन कम्मिंस के माध्यम से, उसकी मृत्यु के तीस वर्ष बाद, उसी अवधारणा का सन्दर्भ देता है, इसे ‘समूह-आत्मा’ कह कर.(जी.कम्मिंस, अध्याय 6, द रोड टू इम्मोराटेलिटी, (मूलतः 1932 में प्रकाशित), वाइट क्रो बुक्स, गिल्डफोर्ड, यू.के. 2012)

[क्रमशः........(अगले अंक में पढ़ें "शरीर के महत्वपूर्ण पहलू")]

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