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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



देश और समाज :- एक चिंतन

मनोरंजन तिवारी


   किसी बड़े साहित्यकार/समाजसेवी ने एक जगह लिखा है कि "जब कोई मजदूर/किसान/कामगार अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए पढ़ाता है कि बड़ा होकर उसका बेटा साहब बन जाये, उसे जीतोड़ मेहनत नहीं करना पड़े" तो वह मजदूर/किसान/कामगार अपने काम का/अपने परिश्रम का तौहीन कर रहा होता है, अपने काम को /अपने परिश्रम को इतना हेय दृष्टि से देखने वाले लोगों का देश कैसा होगा? बिल्कुल हमारे भारत देश जैसा ही होगा। शिक्षा बहुत जरूरी है मानव के सम्पूर्ण विकास के लिए, एक बेहतर इंसान के निर्माण के लिए, मगर कोई पिता अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए पढाये कि बड़ा होकर उसे काम नहीं करना पड़े, सिर्फ ओहदे का इस्तेमाल करके घर भर जाये तो यह शिक्षा बहुत दोषपूर्ण है। होता भी यही है सिर्फ मजदूर/किसान/कामगार ही नहीं हममें से अधिसंख्य लोग अपने परिश्रम से/अपने काम से ऊबे होते है, और दूसरों के बनती बड़ी-बड़ी कोठियों/कारों को देख कर आह भरते है कि काश हम थोड़े और पढ़-लिख कर उसके जैसा बन जाते, उसके पद को पा जाते तो हमारे पास भी यह सब होता। यहाँ स्पष्ट होता है कि वह बड़ी-बड़ी कोठियाँ/ कार सिर्फ मासिक वेतन से नहीं बनते, हम सब जानते है कि यह पैसा बेईमानी का पैसा है, फिर भी हम उनके जैसा ही बनना चाहते है। पढ़ते समय/प्रतियोगी परीक्षाओं के तैयारियों के समय बहुत कम मित्र ऐसे थे जो बड़ा ऑफिसर बन कर देश के भ्रष्टाचार को ख़त्म करना चाहता हो, देश के हालात को बदलना चाहता हो, अधिसंख्य मित्रों का मकसद सिर्फ परीक्षा पास कर बड़ा आदमी बनने की चाह ही रहती है।

  देश के हालात तब तक नहीं बदल सकता जब निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति /मजदूर/किसान/कामगार को सम्मान के नज़र से नहीं देखा जाने लगेगा। लोग कहते है कि मोदी जी के आने से देश का माहौल बदला है, मगर हम सब जानते है कि देश के माहौल को कोई मोदी/कोई सरकार नहीं बदल सकती। हाँ एक उम्मीद जरूर पैदा हुई है कि देश बदलेगा, मगर देश तब बदलेगा जब यहाँ रहने वाले लोगों का सोच बदलेगा। मोदी जी/ या सरकार क्या इस दिशा में कोई काम कर सकते है कि सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति/मजदूर/किसान/कामगार को सम्मान के दृष्टि से देखा जाने लगेगा?

  हमारे देश में/हमारे समाज में या यूँ भी कह सकते है पुरी दुनिया में कामयाब लोगों की कामयाबी देखी जाती है, मेहनतकश लोगों की मेहनत नहीं देखी जाती। सम्मान उसी का होता है जो येनकेन प्रकारेण सीढ़ियाँ चढ़ते -चढ़ते ऊपर पहुँच जाता है।

  सिर्फ मजदूर/किसान/कामगार ही नहीं बल्कि हर क्षेत्र में मजदूर है। लेखन के क्षेत्र में लेखक अपनी उम्र गुजार देता है, दिन-रात पेपर पर कलम घिसते -घिसते मगर सम्मान/यश/धन उन्हें नहीं मिलता बल्कि प्रकाशकों को मिलता है, या उन्हें मिलता है जो जानते है लॉबिंग करना, लोगों को इस्तेमाल करके ऊपर चढ़ना जानते है, सम्मान उनका होता है। प्रेमचंद/निराला/मुक्तिबोध किसी को भी उनके जीवन काल में वह सम्मान नहीं मिला, सम्मान मिला मगर तब जब वे प्रकाशकों के जरूरत बन गए।

  हमारे यहाँ शिक्षकों को पहले बहुत कम वेतन मिलता था, जिसके प्राइवेट ट्यूसन की परंपरा शुरू हुई जो आगे चल कर कोचिंग सेंटर/शिक्षण माफिया में तब्दील हो गई है। हमारे यहाँ वैज्ञानिक बनने में ज्यादा छात्रों की रुचि नहीं होती क्योंकि दिन-रात मेहनत/परिश्रम करने के बाद भी एक इंजिनियर से भी कम कमा पाते है वैज्ञानिक, और सम्मान ? उनके दफ्तर के क्लर्क का ज्यादा होता है एक वैज्ञानिक से। कारण स्पष्ट है हमारे यहाँ सब कुछ बाजारवाद से नियंत्रित होता है अगर आपके पास पैसा नहीं है तो सम्मान भी नहीं है।

  चित्रकार/कलाकार/नृत्यकार /नाटककार ये सब भी जीवन भर संघर्ष करते है, मगर सम्मान सिर्फ चंद लोगों का ही होता है। यहाँ तक कि राजनीति में भी ऐसे बहुत लोगों को मैं जानता हूँ जो दिन-रात लोगों के समस्यायों को सुलझाने में लगे रहते है, अपने निजी काम को त्याग कर भी, मगर सम्मान उन्हें मिलता है जो मौके पर चौका मार कर कुछ बन जाते है।

  एक बार सुविख्यात अभिनेता अक्षय कुमार ने स्वीकार किया था कि वो खुशकिस्मत है जो इस मुकाम पर है, वरना " मुझसे बेहतर दिखने वाला/प्रतिभाशाली सैकड़ों नवजवान है जो क्रूमेम्बर से आगे नहीं बढ़ पाते फिल्म इंडस्ट्री में। यह असमानता हर जगह है, हर जगह चढ़ते सूर्य को नमस्कार करने की परंपरा है।

  हमारे क्रिकेटर/सेलिब्रिटी जितना अपने काम से नहीं कमाते उसके सौ गुना अपने शोहरत के बदौलत कमाते है, मेरे या आपके कहने से यह रूक नहीं सकता, मगर यदि वे क्रिकेटर/सेलिब्रिटी चाहे एक बेहतर देश बनाना /एक बेहतर समाज बनाना तो वो अपने शोहरत के कमाई को अन्य खेलों /अन्य कलाओं पर खर्च करके अपने जैसे बहुत सेलिब्रिटी पैदा कर सकते है, मगर वो ऐसा नहीं करते। प्रतियोगिता है, जहाँ इतना पाने के बावजूद भी कोई ब्रांड हाथ से निकल जाने से मलाल होने लगे वहाँ कोई क्यों अपने लिए इतने प्रतियोगी पैदा करेगा?

  मगर यह परंपरा सही नहीं है, देश का यह माहौल अच्छा नहीं है। अच्छा तब होगा जब मेहनत करने वाला वर्ग सम्मान को महसूस करने लगेगा, जब मजदूर/किसान/कामगार/कलाकार/चित्रकार/नाटककार/लेखक ( मेहनत करने वाले वर्ग ) को सम्मान मिलने लगेगा। देश तब बदलेगा। मोदी जी क्या इस दिशा में कोई काम करेंगे? उम्मीद है, क्योंकि वे स्वयं उस वर्ग से आये है। मगर यह उम्मीद बहुत भारी है, मुश्किल है। देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है। हमारे आने वाली पीढियों को ईमानदार/मेहनती/कार्यकुशल बना कर एक सक्षम/ शक्तिशाली राष्ट्र निर्माण के लिए इस चुनौती को/इस उम्मीद को पुरा करना बेहद जरूरी है।

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