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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



दोस्त

मनोरंजन तिवारी


   सामने से फोन पर आवाज आई,

   आज के बाद मुझे कभी फोन मत करना,

   उसने भी ज़ोर से चीख कर बोला,

   " हाँ- हाँ नहीं करूँगा" .....अगर मुझमें जरा सा भी ग़ैरत है तो, आज के बाद ना कभी तुम्हे फोन करूँगा, ना तुम्हारी सुरत देखूँगा और ना ही कभी तुम्हारे बारे में सोचूँगा......फिर अपनी आवाज़ को और भी ज्यादा तीक्ष्ण करते हुआ बोला " समझी तुम? फोन रखो"......

   इतना कह कर उसने फोन को नीचे पटक दिया,

   फिर अपने जूते से कई वॉर कर मोबाइल के टुकड़े-टुकड़े- टुकड़े कर दिया और सिम कार्ड को निकल कर दाँतों तले दबा कर चबाने लगा ........यहीं कोई पांच मिनट तक चबाते रहने के बाद, एक बिजली सी कौंधी " उसकी आवाज़, इतनी भरभराई हुई क्यों थी? और वह दौड़ता हुआ बगल के कमरे में गया, टेबल पर रखा, अपने दोस्त का फोन उठा कर रिंग किया,

   " तुम रो रही हो ना?"

   उधर से आवाज़ आई, " मैं तो नहीं रो रही, तुम्ही रो रहे हो, क्यों क्या हुआ?

   कुछ नहीं, बस फोन गीर कर टूट गया मेरा, इसीलिये .....फिर दोनों काफी देर तक हंसते- बतियाते रहे।

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