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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



रास्ता

शबनम शर्मा

होश संभलते ही 
शुरु हो गया चलना
ज़िन्दगी के रास्ते की ओर, 
बिन परवाह किये, गरम हवाओं की, 
सरद थपेड़ों की, बर्फीले टीलों की, 
गरम रेगिस्तानों की, मैं बढ़ती ही गई, 
कई बार कोशिश थी ओलों की 
जो बरसे मेरे सिर पर, 
पर मैं न रुकी, क्यूंकि मुझे 
पकड़नी थी मंजिल की वो हवा 
जो सुकून देती ताउम्र,
आ गया मंजर, धीमी पड़ गई 
दौड़ की गति, 
लगा उलटी गिनती शुरु हो गई थी 
कभी भावनाएँ, किसी भी मौसम से 
न डरी, 
अब मन सिर्फ सोच भर से कांपने लगा, 
क्यूंकि दौड़ में शामिल हो गये थे 
कई ज्वालामुखी, जिन्हें पार करना 
मेरे बस में न था।
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