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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



पीड़ा

शबनम शर्मा]

कितनी कठिन वो पीड़ा 
सहनी, जो शब्द नहीं 
रखती, 
सिर्फ और सिर्फ
आप महसूस कर सकते, 
जो तुम्हें अपनों ने 
दी हो, 
कुछ शब्दों से, 
कुछ इशारों से, 
टूट जाता है सब 
बिखर जाता है सब 
रह जाती सिर्फ़ ये 
देह जो कुछ कर नहीं सकती, 
तड़पता है दिन, 
रोती है रात 
पर क्या फ़र्क पड़ता है 
किसी को?
पीड़ा सिर्फ उसकी है 
जो सहन करते हैं 
उनकी नहीं जो 
देते हैं।
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