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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



मेरी तस्वीर

शबनम शर्मा

मैंने अपने हाॅल में,
अपने बचपन, जवानी 
और आज की तस्वीर 
लगा दी, 
आया वो बरसों बाद,
बैठा, निहारने लगा, कमरे में
लगी तस्वीरों को,
धीमे-धीमे कदमों से
चलता रहा, बुदबुदाता,
मुस्कराता, खुद से खुद 
को कुछ कहता, फिर से 
बैठ गया सोफे पर, 
पूछ ही बैठी, ‘‘क्या सोच रहे हो?’’
चाय की चुसकी लेते, 
मेरी ओर देखते मुस्कराया, 
बोला, ‘‘ये तुम्हारी सब 
तस्वीरें कुछ बोल रही, 
वही सोच रहा था,
बस क्या कहूँ, बस इतना ही काफी 
कि तुम बच्चा भी प्यारा थी, 
लड़की भी और आज इक माँ और 
बीवी भी सुन्दर हो।’’
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