Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



सपनों की पगडण्डी

राज कुमार जैन 'राजन'

कितनी बार मोहभंग हुआ
खुद से खुद को तलाशने में
विषमताओं के बवण्डर में फंसा
अनुत्तरित प्रश्नों के घेरे में
अपना अस्तित्व कब तक
कायम रख पाऊंगा

जिन्दगी से समझौता तो सिर्फ
इसी शर्त पर है कि-
कभी तो स्याह अंधेरे से निकलकर
सुनहरे उजियारों को छू पाऊंगा
और महकने लगेगी जीवन की बगिया

पर हर बार
मोहभंग के क्षणों में
विश्वास-किर्च-किर्च बन टूट-सा गया
रिश्ते आजकल
कटूता की हल्की-सी आंच में भी
भाप बन उड़ जाते हैं
दोहरा जीवन, दोहरे प्रश्न
हर जगह दोहरापन
आखिर अपनी पहचान
बताना चाहूँ भी तो कैसे?

सपनों की पगडण्डी पर चलते-चलते
थम गए हैं मेरे पांव
भौतिकता के मीठे विष में
विश्वास भी गलत साबित होने लगा

मैं तो इन पीड़ाओं में भी
चल रहा हूँ, बढ़ रहा हूँ
सूर्य की तलाश में
भर देगा जो जीवन में 
सफलताओं के उजाले
एक नई सपनों की पगडण्डी
खुलने लगी राह में!
www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें