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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



अंधकार के बीज

राज कुमार जैन 'राजन'

ज्योति-पर्व पर
जला रहे हो पीड़़ा के दीप
लील चुका है तम
परंपरा, संस्कृति और संस्कार

ज्योति-पर्व के अस्तित्व बोध में
अंधेरे से लड़ना चाहते हो
तो आओ
जला लो अपने भीतर की मशालें
संजो लो अंतर्मन में
अस्तित्व बोध का दीप

मन में जब जलती हैं मशालें
तब खुद-ब-खुद बदलने लगती हैं
इतिहास की इबारतें
कटने लगती हैं संवेदना की फसल

अपने अभिमान में
खण्ड-खण्ड होते आदमी हो तुम
समय के चित्र फलक पर गलत तस्वीर मत खींचो
ज्योति-पर्व पर
अंधकार के बीज मत बोओ
तुम्हारे भीतर एक सरसब्ज बाग है
उसे सींचो
जो प्रकाश मौन और म्लान हुआ है
देवदूत की तरह अंधकार को काटो

तुम पर समूचे भविष्य की आस्था है
और जिन्दगी महज अभिमान में तार-तार
अंधेरे का घोषणा पत्र नहीं
रूप है, रस है, गंध है, उजास है
आदमी आत्मा का छंद है।
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