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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



"उतरते हुए"

गौरव भारती

जब सर्दी का मौसम
बयार के साथ 
मेरी खिड़कियों पर थपकी देने लगता है 
ओस की स्याही से जब वह
काँच की खिड़कियों पर कुछ लिख जाता है 
मैं देखता हूँ उसे
पढ़ता हूं हर्फ़ हर्फ़ उसका
सूरज के उगने से पहले
हरी घास पर 
अटकी हुई ओस की बूँदे
यह अलसायी सी सुबह ...
अंगड़ाई लेकर बार-बार उठना चाहती है 
लेकिन फिर लिहाफ़ ओढ़ कर सो जाती है
हथेलियों से चिपकाए
चाय से भरी कप 
अब जब ....
चंद चुस्कियाँ जीभ पर तैरती हुयी 
गले में उतरती है 
मैं भी उतरने लगता हूँ 
सामने टंगी तुम्हारी तस्वीर में 
हौले-हौले
यह तस्वीर भी सर्द के शाम की है 
एक यादगार शाम
जिस दिन शायद मैंने 
चाय की चुस्कियाँ भरनी सीखी थी 
हवा में भी एक स्वाद होता है
महसूस किया था
शाम हमेशा बोझिल नहीं होती
जाना था...
आँखे बहुत कुछ कह जाती है
देखा था...
ख़ामोशी की अपनी जुबान होती है
समझा था ....
मुझे याद है ..
तुम्हारी वह लंबी बुनी हुयी आसमानी स्वेटर 
छुपी हुई हथेलियाँ
ताका-झांकी करती 
लंबी उँगलियाँ
मैं लगा रहा होता गणित
स्वेटर की डिजाइन को लेकर
और तुम्हारी बड़ी-बड़ी आँखे मुझे ऐसे घूरती
मानो शाम शिकायत कर रही हो
मेरे अल्फ़ाज़ डरते हैं
आज भी डरते हैं जुबां पर आने से 
शायद इसीलिए लिखता हूँ मैं 
मैं अब लिख सकता हूँ 
बहुत सारे अफसाने 
जिसमें तुम्हें गढ़ सकता हूँ
अपने मन माफ़िक 
लेकिन नहीं गढ़ता
क्योंकि मेरा गढ़ना 
एकांकी लिखना होगा
जिसमें तुम अटोगे नहीं ....
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