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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



“मर्दाना राग”

गौरव भारती

तुम नहीं हो 
नहीं हो आसपास 
तुम दूर हो 
बहुत दूर हो
मेरी नज़रों से कोसो दूर
हाथों की पहुँच से बाहर 
हवा भी तुम्हारी खुशबू ..
मुझ तक ला पाने में असमर्थ है
ऐसे में जब मैं तुम्हें गढ़ता हूँ
अपने लिए अपनी खातिर 
तुम्हारे साथ न्याय नहीं कर पाता हूँ 
तुम्हारे किरदार को दबाने की कोशिश में लग जाता हूँ 
तुम्हें क्रांतिकारी लिबास नहीं पहना पाता हूँ 
शायद यहाँ भी खोने के डर से 
या फिर कुछ है जो हावी हो जाता है मुझ पर 
और मैं गढ़ने लगता हूँ तुम्हें 
सौंदर्य के रूपक के तौर पर 
अपने अल्फ़ाज़ खर्च करने लगता हूँ 
तुम्हें सजाने में
उपमान ऐसे ढूंढ कर लाता हूँ 
जो तुम्हें बस सुंदर दिखाता है 
कोमल दिखाता है 
नहीं लिखता हूँ तुम्हें मैं ओजस्वी 
तुम्हें धकेल देता हूँ नेपथ्य में कहीं
जहाँ तुम्हारा राग सिर्फ मेरे लिए गूंजता है 
जहाँ तुम्हारा साज तुम्हारा रूप लावण्य सब मेरे लिए है 
तुम्हारे विचार मेरी अनुपस्थिति में गूंजती हैं 
लेकिन नेपथ्य की दीवारों से टकराकर गिर जाती है शून्य में 
मानो निर्वात में कोई चीख रहा हो
अब मैं सोचता हूँ 
तुम्हें गढ़ना छोड़ दूं 
मेरे शब्द तुम्हारी उस चीख के सामने बौने से लगते हैं 
मैं जला डालना चाहता हूँ उस मैं को 
जला डालना चाहता हूँ सौन्दर्यशास्त्र 
लेकिन कुछ है जो टूटता नहीं 
कुछ है जो छूटता नहीं 
एक मर्दाना राग मक्खियों की तरह आसपास भिनभिनाने लगता है
चुनौती देने लगता है 
मैं झुक जाता हूँ 
मेरे विचारों पर ग्रहण लग जाता है 
अब मुझे भी धकेल दिया जाता है 
जबरन बहुत बेरहमी के साथ 
अब न प्रेम कर सकूँगा
न ही क्रांति
मामला दरबारी हो गया है ।
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