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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



“तेरी तस्वीर को देखे बिना चारा ही क्या है”

डॉ० अनिल चड्डा

तेरी तस्वीर को देखे बिना चारा ही क्या है,
जीने का अपने पास अब सहारा ही क्या है। 

कांटे तो कांटे, फूल भी अब चुभने लगे हैं,
मतलबी दुनिया में रहा हमारा ही क्या है।

न जाने कितना जीयें, कब आ जाये मौत,
अभी तक जिंदिगी में संवारा ही क्या है।

बहुत सारे कर्ज हैं दुश्मनों के सिर पर,
कर्ज मैंने कोई अभी उतारा ही क्या है।

‘अनिल’ तो जवाँ था, जवाँ ही रहेगा,
हम जैसा आना कोई दुबारा ही क्या है।
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