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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



“कोई क्या पहचानेगा”

डॉ० अनिल चड्डा

जो मेरा रोना समझ न पाया, वो हँसने को क्या जानेगा,
मेरे दिल के आंसुओं को भला वो कैसे पहचानेगा |

निकल जाती है बेसाख्ता आह, यूँ ही कुछ सोच कर,
दर्दे-दिल मेरा यहाँ कोई क्या जानेगा |

गुजरती जा रही है जिन्दगी, न जाने कब थम जाये,
डरने वाला, तूफां से भिड़ने की क्या ठानेगा |

जागती आँखों से सोना, किसी किताब में पढ़ा नहीं,
आराम करने वाला लम्बी चादर क्या तानेगा |

जिनके नसीब में भटकना ही बदा हो सदा ,
 वो रास्तों की खाक क्या छानेगा |
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