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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



“अतीत से मुलाक़ात”

डॉ० अनिल चड्डा

कभी-कभी अतीत से जब
मुलाकात हो जाती है 
तो वर्तमान पूछ बैठता है
तुम्हारा अब क्या काम है
तुम तो केवल एक परछाईं हो 
जो सपने की तरह आते हो
आँख खुलते ही 
लुप्त हो जाते हो
तुमसे क्या दोस्ती करूँ
बेबात ही 
तुम मुझे तड़पाते हो 
मेरा और तुम्हारा
भला क्या साथ 
क्यों जबर्दस्ती
मेरी राह में चले आते हो
अतीत
तो सभी का होता है 
पर तेरे लिये 
कोई आपा तो नहीं खोता है 
इसलिये तुझे
सावधान करता हूँ
आज जब कल 
अतीत में बदल जायेगा
तो तुझे
पीछे धकेल जायेगा 
तेरा अस्तित्व
धीरे-धीरे फीका पड़ जायेगा
फिर तू कहाँ याद आयेगा
किसको याद आयेगा
किसी को भी नहीं याद आयेगा
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