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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



विकासवाद

अमरेन्द्र सुमन

विकासवाद की चमकती आंखों से रीतती
नदी सी एक औरत के सर्वांग की पड़ताल 
नहीं चाहती थी वह 
इत्तफाक के बाजुओं का कंटीला स्पर्ष
बॅंूद-बूॅंद पानी की तरह 
संग्रह किये सपने उड़ते गए वाष्प बन 
और रीतती गई नदी की मानिंद 
पल-प्रतिपल जेठ की तपती दोपहरी में 

जब वह थी शहर से दूर विराने में अकेली
पगडंडियों की वैसाखी थामे
उसने नहीं रोपे थे महत्वाकाक्षांओं के बीजड़े बंजरों में 
और न ही उगाए थे उम्मीदों के कलमगाछ

वह आयी थी उसठ देहात से 
धूल भरी हवाओं में उड़ती 
जैसे कोई अलवलेया का डंठल 
पानी के दबाव में बहता गिरता-पड़ता

कहीं अटक गया हो 
वह भी अटक गई थी शहर के चकाचैंध में 
भ्रम के लैम्पपोस्ट से 

सहानुभूति के दो हाथ बढ़े उसकी ओर 
जैसे लम्बे दिनों से प्रतीक्षारत हों 
बटोर लेने को सबकुछ उसका 
एक अनचिन्हे चेहरे की खामोषी को महसूसते 

एक बड़े से शहर में जहाॅं लोग मोटर के पहिये बने फिरते हैं
अजनबी दो हाथ व्यग्र थे खैराती में मिले 
नर्म-नर्म माॅंस के लोथड़े नोंचने की खातिर

एक भटकती जीवित आत्मा
जो थी अनभिज्ञ चेहरों के पीछे छिपे चेहरों से 
लिपटती गई पतंग की डोरी सी आकर्षण की लटाई में 

कई-कई मुर्दे खड़े हो उठे एक साथ 
उसकी लाचारी से संभोग करने 
जिन्हें जीवितावस्था में नहीं था प्राप्त सबकुछ 
जो किसी की जिन्दगी के लिये अनिवार्य सा होता है
वह पिसती चली गई 
काम क्रोध लोभ मोह अहंकार के कोल्हु में निरंतर 

शेष था आॅक्टोपस रुपी शहर के जबड़े से 
छोड़े गए विचारों भावनाओं का रिट्ठा 
जो शहर के चैराहे पर प्रष्नचिन्ह्् बन खड़ा था 
विकासवाद के चमकते खंभे के नीचे 
निरंतर विकसित होती सभ्यता के खिलाफ
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