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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



प्राप्त कर लेना चाहता हॅू

अमरेन्द्र सुमन

वह मेरे लिये उतना ही महत्वपूर्ण है
पौधों के लिये 
जितनी हवा पानी प्रकाष
नींद के लिये तीसरे पहर का स्वप्न

जद्दो-जहद् में थका-उदास होता हूॅं जब
एक अनजाने शरीर की संतुष्टि स्थानान्तरित 
होती है मुझमें
देती है भर अन्दर एक परिपक्व उत्साह
आगत समस्याओं से जूझने

सहेजना चाहता हॅूं हिदायतें उसकी
पहली मुलाकात से पल भर पूर्व तक की
उसने दिये समय-असमय जो मुझे

कर लेना चाहता हूॅं कैद आॅंखों के पिटारे में
उसके स्पर्ष से प्राप्त उर्जा को
संक्रमण काल में ढाल के रुप में व्यवहृत हेतु

और भी बहुत सी चीजें 
कर लेना चाहता हूॅं उसकी हजम
जिसे पाने की तकलीफों से चुराता रहा जी लम्बे समय तक

बुरी तरह से चिपट जाने का आत्मीय सुख
एक शरीर से जूड़े रहने की व्यवस्थाऐं
औरत के उदार संस्कारों की तस्वीरें  
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