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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



"ओ दीप तुझे जलना होगा"

मनोज शुक्ल

ओ दीप तुझे जलना होगा, तूफां से लड़ना होगा ।
इस घने तिमिर के रात्रि पहर में, उजियारा करना
होगा ।।
 
जाति –पाँत की फसलें उगती, राजनीति के बागानों में ।
लज्जित सी आहत मानवता, सिसक रही शमशानों में ।।
 
स्वार्थ,मोह के गलियारों में, सारा तंत्र कलंकित है ।
गिरे चरित्र के इस  पारे से, हर जन -मन आतंकित है ।।
 
खुलेआम नारी की अस्मत, लुटती भरे बाजारों में ।
आहत मानवता की चीखें, गूँज रही अखबारों में ।।
 
तुलसी , नानक और कबीरा, बंद पड़े तहखानों में ।
मस्ती ,लोफर और आवारा, बिकते हैं दुकानों में ।।
 
गोली की चलती बौछारें, शांत हिमालय की घाटी में ।
जब चाहे नापाक कदम भी, बढ़ते देश की माटी में ।।
 
गुरू -ग्रंथ के शबद कीरतन, खोये बमों धमाकों में ।
गुरुनानक गोविंद की वाणी, खोयी आज फिजाओं में ।।
 
उग्रवाद, आतंकी  किस्से, गूँजे गली बाजारों में ।
रिश्वत , भ्रष्टाचार, घोटाले, छाये हर अखबारों में ।।
 
बेईमानी की फसल उगी है, खलिहानों में अटी पड़ी है ।
चरित्रवान के घर आँगन में, नेकी अब लाचार खड़ी है ।।
 
सिसक रही मरियम और सीता,आहत मन का ताजमहल है ।
रोती है कुरान - बाईबिल, गीता सँग रामायण नम है।।
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