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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



“हर बात याद आयेगी”

डॉ० अनिल चड्डा

जब भी मौत आयेगी, जिन्दगी याद आयेगी
बीते हुये लम्हों की हर बात याद आयेगी ।

गलियों में खेल खेले थे, कभी नहीं अकेले थे,
लुका-छुपी और ऊँच-नीच के सुबहो-शाम के रेले थे ,
कुट्टी कभी, कभी अब्बा थी, हर बात याद आयेगी ।

स्कूल के चोर बन गये, कभी चले गये, कभी नहीं गये,
कोई फ़िक्र नहीं, कोई गमीं नहीं,मस्ती के  दिन थे कट रहे,
खाया, पीया, सो गये, हर बात याद आयेगी ।
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