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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



“अपना धर्म”

डॉ० अनिल चड्डा

जीवन जाने कब चुक जाये, कब हो जाएँ श्वास ख़त्म,
बात बात में मैं को छोड़ो, कैसा झगड़ा, कैसा अहं ।

अपनी अपनी परिभाषाएँ हैं, सबकी अपनी आस्थाएँ,
कहीं तो रास्ता एक मिलेगा, अगर बढ़ाओगे ये क़दम ।

हार नहीं कभी होगी अपनी, नाक नहीं झुक जाएगी, 
अपनी बात कहने से पहले, सुन लो गर दूजे का मन ।

यत्न कभी बेकार न जाये, करके देखो दिल से यत्न,
चींटी गिर-गिर के भी देखो नहीं छोड़ती करना कर्म ।

मानुष सारे एक ही जैसे, अलग-अलग पर सबके कर्म,
जैसी करनी, वैसी भरनी, रखना मत तुम कोई भ्रम ।

दोस्त नहीं मिलते जीवन में, दुश्मन चाहे लाख बनें, 
फिर भी सबसे हँस कर मिलना, यही समझना अपना धर्म ।
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