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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



जब कोई मुझको बनाता है म़जा आता है

विश्वम्भर व्यग्र

जब कोई मुझको बनाता है म़जा आता है
बात  अपनी  वो  छुपाता है म़ज़ा आता है

हमने विश्वास किया शोख़ पे खुद से ज्यादा
अपनी चतुराई दिखाता है म़ज़ा आता है

चेहरा मासूम ना करता है हक़ीकत उसकी
जब भी वो ऩाज उठाता है म़ज़ा आता है

सहज  भोलापन  गहनें  सदा  रहे अपने,
चमक उनकी जो चुराता है म़ज़ा आता है

बाल खोपड़ी के जो सफेद हो गये सारे,
काले जब कोई बनाता है म़ज़ा आता है

पैसा भगवान नहीं व्यग्र मगर कम भी नहीं,
जाल अपना वो बिछाता है म़ज़ा आता है
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