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वर्ष: 1, अंक 11, अप्रैल(द्वितीय), 2017



“कितना दर्द दिखाऊँ”

डॉ०अनिल चड्डा

कितना दर्द दिखाऊँ जग को, कि इसका एहसास करे, 
कौन बढ़ाए ख़ुशियाँ मेरी, कौन जो दिल के पास रहे ।

रोज़-रोज़ इक जीवन जीता, रोज़-रोज़ इक मौत मरूँ,
कोई तो पल मिले ख़ुशी का, साँस हरेक ये आस करे ।

बढ़ती जाए बेल उम्र की, आए न कोई शाख़ नई,
रूखे-सूखे सावन बीते, बेरंगी मधूमास रहे ।

जीवन की नदिया बहनी है, और सागर में मिल जानी है,
मंज़िल तो सब की एक ही है, क्यों बेकार उदास रहे ।

इक दिन यादें उड़ जानी हैं, इक धुएँ में मिल जानी हैं, 
न याद करो बीती बातें, बस आज पे ही विश्वास बने ।
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