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वर्ष: 1, अंक 10, मार्च, 2017



वो पल

शबनम शर्मा

वो पल जब तुम आये, 
मेरा हाथ माँगने, पर 
निकाल दिये गये घर से, 
ये कहकर, ‘‘तुम्हारी जाति 
हमसे मेल नहीं खाती।’’
टूट गई मैं 
ब्याह दी गई अपनी जाति में,
जहाँ सदैव कुंठित रही,
एक भी साँस आज़ाद न था,
ज़लालत की हदें पार थी, 
प्यार का मतलब सिर्फ
स्वार्थ ही था।
बर्बाद हो गया मेरा सम्पूर्ण 
अस्तित्व। मैं सिर्फ बनी 
उनके घर का इक पायदान। 
याद आता मुझे सदैव 
तुम्हारा वो बाँहों में समेटना,
छोटी-छोटी बात पर मुझे संभालना,
कहाँ थी जाति, सिर्फ मन और 
आप। क्यूँ बंधते हैं हम 
इन ढकोसलों में
मन की जगह।

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