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वर्ष: 1, अंक 10, मार्च, 2017



कागज़

शबनम शर्मा

शायद नहीं जानता 
ये अबोध बालक, 
इस कागज़ के 
टुकड़े की कीमत, 
तभी मरोड़ रहा, 
फाड़ रहा और हँस रहा।
हो जायेगा बड़ा,
सिखायेगा यही कागज 
इसे सबक,
जब सामने आयेगी 
पोथी, पैसा और 
हर खाना कागज़ में
लिपटा,
बन जायेगा कागज़ ही 
उसकी कसौटी
कभी रिजल्ट, तो कभी 
परीक्षा, कभी प्रश्न तो 
कभी उत्तर, कभी चिट्ठी 
तो कभी जवाब।
कभी रसाले तो कभी 
अखबार,
कभी हँसी, तो कभी दुलार।
नहीं होगा उसका 
रिश्ता इससे खत्म, 
लाठी टेकने तक,
अरे नहीं मरणासन पर 
भी ले आएगा कोई
कागज़,
पकड़ कर लगवा देगा 
अंगूठा, खींच लेगा 
तस्वीर कागज़ पर 
और फिर बहा दिया 
जायेगा इक पुड़िया 
बनाकर गंगा के 
पानी में नाव की 
तरह इस कागज़ पर।
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