Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक 10, मार्च, 2017



बेगुनाह


संजय वर्मा

प्रसव वेदना का दर्द 
झेल चुकी माँ 
खुशियों के संग पाती 
नन्हें शिशु को । 

होठों से शीश चूमती 
तभी कल्पनाएँ भी जन्म लेने लगती
उसके बड़े हो जाने की । 

नजर न लगे 
अपनी आँखों का काजल 
अंगुली से निकाल
लगा देती है टीका 
बीमारियों के टीके के साथ ।


किंतु वे बेगुनाह   
माँ के दूध का कर्ज 
कैसे अदा करेंगे ? 
जो  इस दुनिया में 
 भ्रूण -हत्या की वजह से नहीं है । 
www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें