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वर्ष: 1, अंक 10, मार्च, 2017



नारी

रेनू सिरोया कुमुदिनी

(1)
प्रीत भरी चिट्टी कोई जब हवा उड़ाती है
दिल के अरमानों पर जैसे पंख लगाती है !!

बरस के बूंदे गगन से यूँ धरती पर आती है 
जैसे बिटिया पीहर से पी घर को जाती है !!

 धरा पे गिर कर वो बूंदें  उसमे मिल जाती है 
 मिलकर संग वो खुशियों का वंश उगाती है!!

 बदली में जब छुपी धूप यौवन पर आती है 
जैसे छोटी सी कोई गुड़ियाँ जवां हो जाती है!! 
  
यौवन की दहलीज पे आकर स्वप्न सजाती है 
प्रियतम को फिर देख''कुमुदिनी''ये खिल जाती है!! 
(2) 
सागर सा विस्तृत आँचल, 
जिसमें मिलती है, 
ममता की हज़ारों नदियां, 
वात्सल्य 
और समर्पण की, 
जलधारा में मिलकर, 
भुला देती है 
अपना अस्तित्व, 
मासूम कलियों को खिलता देख, 
होती 
हैं निहाल, 
उनकी खुश्बू में समा लेती है खुद को, 
धूप में छाँव सी, 
वीराने में गाँव सी, खुद 
को बना लेती है वो, 
ज़िन्दगी के विशाल आकाश में, 
टूटा तारा बनकर, 
अपने
बच्चों की खुशियों के लिए, 
टूट जाती है वो, 
प्रकृति के 
हर रूप में समाती है नारी, 
एक रूप में कई रिश्ते निभाती है नारी!
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