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वर्ष: 1, अंक 10, अप्रैल, 2017



सभ्यता के सफर में

राजकुमार जैन राजन

सभ्यता के इस सफर में
रोज टूटते हैं कुछ सपने
हमारी आशाएं मकड़ी की तरह
जाले बुनती हैं
और मन के समंदर से उठता है
संवेदानाओं का सैलाब

हर कहीं राह में
दम तोड़ते हैं
कचरे-अधकचरे विचार
एक नया सवेरा पुकारता है मुझे
काले अंधेरों के पीछे से

हर इंसान के चेहरे पर
एक नकली चेहरा है
छद्म हंसी के पीछे
कपट बहुत गहरा है
आत्मीयता के स्थान पर
मुखौटे रिश्तों के रूप में मिलते हैं
सच झुठलाया जाता है
और झुठ सभ्य व्यक्ति की तरह
हाथ बांधे खड़ा मुस्कराहता है

तब मैं उगते हुए सूरज को
आशा से देखता हूँ
उसकी हर किरण में
गति और जागरण का संदेश पाता हूँ
उम्मीद के पंख लिए
ख्वाहिशें फिर
आसमान में उड़ने लगी हैं
मुझे विश्वास है, आज नहीं तो कल
मैं फिर चलूंगा आपनी संपूर्ण ऊर्जा  से

अब नहीं टूटेगा कोई सपना
स्वयं के पुरुषार्थ से।
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