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वर्ष: 1, अंक 10, अप्रैल, 2017



खण्ड-खण्ड अस्तित्व

राजकुमार जैन राजन

मरे हुए कई रिश्तों को
ढो रहा हूँ वर्षों से
सम्बन्धों के फैल गये विष को
अमृत बनाने की चाह में

जख्म जो उभरे सीने पर
ख्वाब में झिलमिलाते हैं
जब दिल का दर्द आंसू बनकर
आंख से छलकता है
वेदनाएं थकी सांस-सी चलने लगती हैं

मेरी हर अनुभूति, हर इच्छा की
होती रही अग्नि परीक्षा
रिश्तों से मिले हुए विष को
हमने पीने की कोशिश की
सुख की जो डोरी बंधी थी जीवन में
कतरा-कतरा टूट कर बिखरती रही

समय के साथ
संदर्भ भी बदलते गए
शून्य पथ, अंधी दिशाएं
मंजिलों के रास्ते कठिन होते गए
मेरे संपूर्ण व्यक्तित्व की डोर
कब मेरे हाथों से फिसल गई,
पता ही न चला
मेरा अस्तित्व रिश्तों को ढोते-ढोते
खण्ड-खण्ड हो गया

अचानक ही बुझते दियों के उच्छवास-से
अपनी नियति में चुकते प्रश्न चिन्हों ने
अपने ही होने का अहसास जगाया
अभिलाशाएं नए सूरज की खोज में
प्रज्वलित होने लगी
मेरी नाकाम हसरतें अपनी दृष्टि में
प्रकाश भर कर चलने लगी
मंजिलों की राहें स्वयं ही प्रकाशित होने लगी
और
लक्ष्य की पगडण्डियां
स्वयं ही मंजिल छूने लगी।
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