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वर्ष: 1, अंक 10, अप्रैल, 2017



एक नया संघर्ष

राजकुमार जैन राजन

रात चलती रही, रात भर
पीड़ा की घनघोर आंधी में
कल्पनाओं के आसमान ने
विवादों की जुबान बोलते
चमक-दमक को गिरवी रख
सूरज को भी बना लिया बंधक

खुद अपनी ही परिधि में घिरकर
सूर्यमुखी वादों और
विश्वासों के मासूम घरौंदों से
प्रकृति के दामन को तार-तार कर दिया

परछाई नापते सूरज
और हवाओं से उत्पन्न आहटें
पतझड़ द्वारा नंगे किए पेड़-सी
अपने जीवन की
खण्ड-खण्ड हुई विपत्तियों का
अहसास कराती
मौन है

पुरानी पत्तियों के गिरने से 
मरता नहीं कोई पेड़
सृष्टि में यह क्रम चलता रहता निरंतर
बहुत कुछ खोकर भी
बहार आती है फिर हर बार

किरणें धरती पर आकर
खोल देती हैं सुख के बंद दरवाजे
खुशियों के बादल देते अपना अमृत
तब फूटती है नन्ही कौंपलें
देती यह संदेश
शुरू होगा फिर एक नया संघर्ष
हारता नहीं जो परिस्थियों से
जितता है फिर वही
पाता है उत्कर्ष
एक नए सृजन के साथ।
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