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वर्ष: 1, अंक 10, अप्रैल, 2017



वो तेरे सानिध्य की ख़ुशबू

डॉ०अनिल चड्डा

वो तेरे सानिध्य की ख़ुशबू 
जब मैंने तेरी साँसों को छुआ था 
जाती नहीं मेरी साँसों से 
और उसी ख़ुशबू से 
तन-मन को सरोबार करने को
जब मेरी सांसें बढ़ जाती हैं
तो दिल की धड़कनें भी 
यूँ बढ़ जाती हैं
जैसे तेरे सानिध्य से बढ़ीं थीं 
और मेरी कल्पनाओं की उड़ान 
जा बैठती है 
तेरे सानिध्य में 
तेरे सानिध्य में ही !
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