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वर्ष: 1, अंक 10, अप्रैल, 2017



एक वृद्ध की असामयिक मृत्यु से

अमरेन्द्र सुमन

जबकि यह उम्र निश्चित हो 
एक लम्बी जवाब देही की थकान के बाद
सुस्ताने का था
एक बीमार कमरे की हथेली के सहारे टिका वह 
शामिल था अपने भीतर कभी न समाप्त होनेवाली 
यात्रा में अकेले 

इन्तजार में थीं उसके गुजर जाने के
 मंडलाती अनगिनत माॅंसभक्षी आसमानी आॅंखें 
गिरगिट के स्वभाव को जी रहे लोग 
 
बैचेन दिख रहे थे वे प्रशिक्षित दर्जनों हाथ
पल भर में ही टोह लेने को 
तमाम उम्र पसीने से उगाही गई उसकी सारी जमा पूॅंजी
बैंक लाॅकर में आराम फरमा रहे पत्नी के आभूषणों की पोटली
और एक बड़े शहर के व्यस्त इलाके में 
खरीदे गए कट्ठे भर जमीन का रजिस्ट््री पत्र

अन्ततः बूढ़े व्यक्ति की मृत्यु हो ही गई
न चाहते हुए भी,
जबकि यह उम्र उसके गुजर जाने की नहीं थी

जीवित रहा जब तक 
लड़ता रहा आखिरी दम तक 
रिश्तों के कुरुक्षेत्र में अपने ही लोगों से घिरा 
अपनों के लिये

कृत्रिम संस्कारों के दबाब में 
ढक गया एक प्रतीक!
एक विचार!
अस्थियों के बुरादे जब तक नहीं बॅंटे कुद्दियों में 
मर्यादाओं का सूजन शेष रहा बचा 
जैसे बचे होते हैं छिलकों में गुदे के अंश 

उसकी मृत्यु के कुछ ही दिनों बाद 
जीवित हो उठा उसका भूत 
सब कुछ देखता-सुनता पूर्व की तरह
इस बार वह खाट पर नहीं था पड़ा बेवस व लाचार
घर के पिछवाड़े स्थित नीम के पेड़ से 
बस्ती की सीमान्त पर एकाकी खड़ा 
ताड़ के बीच दौड़ता-भागता 
टटोल रहा था वह अपने पूर्वजों के ही बनाए प्रथाओं की खामियों को


समय के दोने से पानी की तरह रिस रहे आस्थाओं को 
जो मजबूर कर गए थे असमय उसकी मौत की उम्र की खातिर
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