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वर्ष: 1, अंक 10, अप्रैल, 2017



कोलम्बस के पैरों पर नामालूम सफर में

अमरेन्द्र सुमन

एहसास की तीखी बयार 
बह रही थी समय केे वातायन से परे
हौले-हौले टकराती उसकी आकांक्षा की देहरी से 

कुछ करने की ललक में 
उसकी उम्र ले चुकी थी शक्ल 
बैरंम डाक से अभी-अभी लौटे उस पत्र सा
जो पल भर बाद ही अपने होने के अर्थ से हो जाता है अनजान

मधुमेह के रोगी की तरह 
उसकी उच्च शिक्षा का प्रमाण पत्र
पड़ा था एक ऐसे अव्यवस्थित आलमारी में 
जहाॅं कुपोषण के मार्किन से बंधे थे 
हजारों की तादाद में बेकाम सी दम तोड़ती डिग्रियाॅं

कोलतार और कंक्रीटों से घिस गए 
तलवे को थिराने की 
अपने कद तक के सराय की उम्मीद लेकर 
वह चलता रहा कोलम्बस के पैरों पर 
अपने अनुमानित ठिकानों को ढूढता 
नामालूम सफर में
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