Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक 10, अप्रैल, 2017



अपनी लाचार सी वैसाखी के सहारे

अमरेन्द्र सुमन

समस्याओं की बॅंसबिट्टी से 
वह चाहता था बच निकलना 
भाॅंड़ी में हाथ डालने से सावधान कपोत की तरह

उसकी जिन्दगी के पिटारे में शामिल थीं 
सीमल के फूल से लुभाते छोटे-बड़े 
अनगिनत -अनब्याहे सपने
रुखाई के चश्में से झाॅकते अपनों के विश्वासघात
कगज की डोंगी पर बिन पतवार सवार 
अनेको अबोध-लापरवाह जिन्दगी

लगातार कोशिशों के बावजूद 
नहीं नसीब हुई चुटकी भर भी खुशी
चाहता रहा पाना जो वह अपनी बची उम्र तक

बिरनी जैसे गुड़ के इर्द-गिर्द 
मंडलाती-मंडलाती चिपक जाती है
वह भी चिपक गया था जिम्मेवारियों के लसलसे से
नामालूम दिनों के लिये

अपनीं खुशियों का गला घोंट 
वह ढोए जा रहा था 
जबरन लाद दिये गए परम्परा के चोले को

विरासत में जबकि उसने नहीं प्राप्त किये थे
घर में रख छोड़ गए नसीहतों की पोटली
जिसका निर्वाह उसके लिये अनिवार्य सा हो

वह जिया जा रहा था 
अपनी लाचार सी वैसाखी के सहार
www.000webhost.com

कृपया अपनी प्रतिक्रिया sahityasudha2016@gmail.com पर भेजें