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वर्ष: 1, अंक 10, अप्रैल, 2017



तेरी तस्वीर देखने को

डॉ०अनिल चड्डा

तेरी तस्वीर देखने को मन कर ही आता है,
सबब-ऐ-बेवफाई जानने को मन कर ही आता है।

जहाँ मिलते, जहाँ चलते थे, वो राहें खो गई अब,
उन उजड़ी राहों पे चलने को मन कर ही आता है।

वो जिन बातों में तुम ही थे, नहीं वो बातें रही अब,
फिर भी बात तेरी करने को मन कर ही आता है।

‘अनिल’ अब कह नहीं पाता मन की बातें खुद से भी,
कभी तो दिल की कहने को  मन कर ही आता है।
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