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वर्ष: 1, अंक 10, अप्रैल, 2017



दोहे

महेंद्र देवांगन "माटी"

तन मन दोनों चंगा हो, रोग न ब्यापे कोय ।
सरल सहज हो काम भी, मिले सफलता तोय ।।

काम करो सब प्रेम से, कटू न मन में आय ।
होत तुरंत ही काज सब, मन में खुशियाँ छाय ।।

शीतल मंद समीर चले, तन को देत कंपाय ।
पूष महिना जाड़ा की , बाहर धूप सुहाय ।।

कोयल कूकत बाग में, सबके मन को भाय ।
कलियन देखी फूल को, तितली भी मुसकाय ।।
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