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वर्ष: 1, अंक 2,  सितम्बर, 2016

हमारी गुरू भक्ति

 

मैं अपने आपको बड़ा सौभाग्यशाली मानकर गौरान्वित महसूस करता हॅूँ कि मैं कम से कम कवि तो बन ही गया क्योंकि मेरे साथ और आगे पीछे जितने के भी जत्थे, कत्थे बनकर मेरे गुरूजी के पास से निकले है वे सब रोजी रोटी से अच्छी तरह लगे हुये है जिनके दर्शन बस स्टैण्ड, रेल्वे स्टेशन में रिक्शा चलाते या अन्तर्राष्ट्रीय खेल सट्टे की पट्टी काटते अथवा जुएँ का फड़ चलाते किए जा सकते हैं। मुझे अच्छी तरह से याद है कि जब हमारे जिले में नया नया गुरूकुल आश्रम खुला तो वहाँ के कई बी एड, डी लिट जैसी विशेष योग्यताधारी गुरू द्रोण और गुरूमाताएँ हम जैसे एकलव्य, अरिूणि, अर्जुन, युधिष्ठिर जैसे शिष्यों को तलाशते अपनी जीविका-पार्जन करने बेबस होकर हमारे महल के कई चक्कर लगाया करते थे। वो बात अलग है कि गुरूकुल का पंजीयन शिष्यों के अभाव में कहीं रद्द न हो जाये इसके भय से अनेक दुर्योधन जैसे शिष्यों को भी गुरूकुल की शोभा बढ़ाने अर्थात् लाज बचाने जबरन भरती किया गया, लेकिन, उस समय हमारे साथ मेनका उर्वशी जैसी अनेक खूबसूरत अतिसुन्दर अप्सराएँ भी शिक्षा ग्रहण करने आया करती थी। उसका लाभ हमें यह मिलता था कि जहाँ हमारे गुरूकुल ना जाने के कारण हमारा महल पिताजी के क्रोध और हमारी पिटाई से अखाड़ा व महाभारत का मैदान बन जाता था, वहाँ अब प्रतिदिन हमारे बिना किसी ना नुकुर के गुरूकुल चले जाने से शांति छाने लगी, हम अनुशासन प्रिय होनहार शिष्य का उदाहरण बन गये, लेकिन, उसके बाद भी हमारे गुरू द्रोणाचार्य हमारा अँगूठा लेने हमारे पीछे हाथ पैर धो कर पिले रहते थे। गुरूवर तम्बाखूँ की पीक की पिचकारी पच से चलाकर आस पड़ौस की दीवार रँगते हुये हमारा भाव गिराने की घात लगाये तरह तरह के ठटकरम और उल्टे सीधे प्रश्नों की बौछार करते, लेकिन, सब्र की सीमा होती है हमारी भी सीमा थी, लेकिन, माननीय अटलबिहारी की तरह नही, हमने भी प्रण संकल्प कर लिया कि आज गुरूवर हमारी अप्सराओं के सामने जो भी हमसे प्रश्न करेंगें उसका उत्तर तत्काल उन्हें देकर अपना भाव और प्रभाव बरकरार रखेंगे, यही संकल्प लेकर हम गुरूकुल पहुँचे। गुरूजी कई गुरूमाताओं को अपने प्रवचन और महिमा का रसपान स्वयं तम्बाखूँ का रसपान करते करवा रहे थे किन्तु, हमारे पहुँचते ही गुरूजी ने हम पर केतु की तरह वक्र दृष्टी डालकर हमारा सिंहावलोकन कर आदतानुसार अप्सराओं के सामने ही प्रश्नों की मार मारी, बताओ, एक रेल तीस किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से जा रही है तो मेरी उम्र कितनी होगी ? हमने, आव देखा ना ताव देखा तपाक से उत्तर रूपी कवच सामने करते हुये कहा-गुरूवर ! पचास वर्ष, लेकिन, आश्चर्य! हमारे गुरूवर जो केतु की तरह वक्र दृष्टि डाल कर हम पर प्रश्न रूपी प्रहार कर रहे थे वे अब देवता की तरह हम पर प्रश्न की जगह प्रसन्नता की बौछार करने लगे और वाह-वाही देते हुए कहा, बेटा ! इतना सटीक उत्तर मैने आज तक नहीं पाया है। तुमने इस प्रश्न को हल करने कौन सा कम्प्युटर दिमाग लगाया है ! हमने कहा- गुरूवर! मेरा एक पच्चीय वर्षीय बड़ा भाई है वह कनिष्ठ है इसीलिए अशिष्ट है आप वरिष्ठ है इसीलिए शिष्ट है वह भी ऐसे ही उल्टे सीधे प्रश्न करता है लेकिन, उसका प्रश्न जरा सरल होता है क्योंकि डॉक्टर कहता है कि वह अभी सिर्फ आधा ही पागल होता है इस उत्तर के बाद गुरूजी सारी चैकड़ी भरना भूल गये परन्तु बन्दर अपनी कूदनी नहीं भूलता गुरूजी भी नहीं भूले एक दिन पुनः अचानक गुरूजी को फिर वैसा ही दौरा पड़ा उन्होंने हमारी ओर प्रश्न बाण छोड़ा बताओं, नेता उदास क्यों था ? और शिक्षक थका क्यों था ? हमने कहा- हे परम पूज्य गुरूदेव ! आपने पूरे प्रश्न का ही सर्वनाश कर डाला है सँही प्रश्न यह है कि गधा उदास क्यों था और साधू प्यासा क्यों था ? जिसका एक शब्द में उत्तर लोटा न थाहमें मुखाग्र रटा है यह हमारे दिल को भी पटा है, गुरूजी बोले- इस घोर आधुनिक कलयुग में जहाँ इंसान-इंसान को खा रहा है वहाँ ऐसे प्रश्नों का कोई औचित्य और अर्थ नहीं होता है ये आत्मा बड़ी दुखती है जब हमारे देश का कानून, समाज, सभ्यता और संस्कृति सहित सूने वन में जाकर रोता है तुम ही सोचो गधे और साधू वाले सॅँही प्रश्न की तरह ना वैसे ईमानदार, वफादार, परिश्रमी गधे रहे और ना ही वैसे तपस्वी, मानवतावादी शिष्ट विशिष्ट योगी, साधक, साधू। इस घोर कलयुग में समय के घूमते पहिये और स्वार्थ ने सभी शब्दों के अर्थ और उनकी परिभाषा बदल डाला है इसीलिये मैने इस प्रश्न का भी समयानुसार स्वरूप बदल डाला है कि नेता उदास क्यों था और शिक्षक थका क्यों था ? हमने, गुरूजी के अन्तर्मन से निकली आवाज और उनके मर्म-धर्म, पावन कर्म रूपी शिक्षा को पहली बार अच्छी तरह जाना पहचाना फिर गुरूजी के प्रश्नों का सही सटीक उत्तर दिया गुरूजी ! वर्तमान काल घोर कलयुग का समय है जहाँ मानवता और लज्जा को गिरवी रखकर युद्ध, धर्म सत्य न्याय पाने के लिये ना होकर केवल स्वार्थ, सत्ता, कुर्सी पाने के लिये होता है युद्ध परिवार का हो या सम्पूर्ण विश्व का उसका प्रमुख एक ही कारण है वह है सत्ता, स्वार्थ, कुर्सी, नेता उदास और शिक्षक थका इसीलिये था क्योंकि कुर्सी नहीं थी, गुरूजी हमारा ध्येय लक्ष्य और उज्जवल भविष्य जानकर हममें अरूणि एकलव्य जैसे महान शिष्यों की झलक पा रहे थे।

 

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