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वर्ष: 1, अंक 2,  सितम्बर, 2016

एक शिक्षक की सेवा निवृति

-      डा. कौशल किशोर श्रीवास्तव

 

          आज वह ककहरा और बारह खड़ी की ज्योति सेवा निवृत हो रही है जो असंख्य वैज्ञानिको अर्थशास्त्रियों चिकित्सकों अध्यात्म गुरूओ में इच्छा से या बलात् जलती रहेगी। वह छोटा जो असंख्य अनहद् नाद होकर कर निनादित हो रहा है, सेवा निवृत हो रहा है।

          यह एवं एक ही वे किनारे है जिन्होने एक झरने को समुद्र बताया अन्यथा तो मां ने उन्हें दूध पिला कर पाठशाला में छोड़ दिया था। मां और बाप का बनाया वह मांस का लोथड़ा शिक्षक ने ही रवीन्द्रनाथ टैगोर, सर सी.वी.रमण और मोहनदास करमचन्द गांधी में तब्दील किया। वह शिक्षक ही सुनीता विलियम्स बन कर अन्तरिक्ष में घूम रहा है। शिक्षक का सिखाया हुआ वह ही है जो असंख्य अर्थशास्त्रो, वैज्ञानिक पुस्तको, कला की पुस्तको में जिन्दा हैं। कितने वैज्ञानिको, चिकित्सको या कलाकारो को याद होगा कि वह शिक्षक सेवा निवृत हो रहा है या उस शिक्षक की संतान भी थी जिसकी शादी में वे लोग नहीं आ पाये ?

          व्यवस्था ने उस शिक्षक के सर्वोत्तम वर्षो एवं काविलियत को साल दर साल वैज्ञानिको, कलाकारो एवं अर्थशास्त्रियों में ढ़ाला है। वह शिक्षक ही दवाइयां बन कर रोगों को ठीक कर रहा है और गणित के नये सूत्र बन कर और नये सूत्रो में ढ़ल रहा है। वही दर्शन शास्त्र के सिद्धांतो में ढ़ल रहा है। योगीराज भगवान कृष्ण, काश आपने गीता के सूत्रो में एक सूत्र भी गुरू सान्दीपनी को समर्पित किया हो तो ! भगवान राम के रूप में हम गुरू विश्वामित्र एवं गुरू वशिष्ठ की  आराधना करते हैं।  एवं भगवान कृष्ण के रूप में गुरू सान्दीपनी की । हालांकि आप स्वयं विश्व गुरू बन गये मेरा सिखाया भूलने पर अल्लाह रहता तो है पर तुम पर प्रकाशित नहीं होता। अच्युत, च्युत हो जाता है। ओम तुम पर प्रकाशित नहीं होता। हर गणना एककी ही पुनरावृति है। ये भाषा, ये गणित जो आकाश में तैर रहे है, मेरे ही सिखलाये हुये हैं। इन्हीं के कारण तुम्हारा नाम है, व इन्हीं के कारण विश्व की हर वस्तु का नाम है। के हटने पर हर अक्षर अपूर्ण हो जाता है।

          ये अक्षर और संख्या अनन्त काल से ऐसे चले आ रहे है। बस तुम इन्हे जानते नहीं थे। मैनें तुम्हारी इस लिखित रूप में इनसे पहचान करवाई। मुझे भी तुमसे पहलें इन्हें सीखना पड़ा है। तुम्हारे मां बाप ने जाकर कुछ शब्दों का ज्ञान तुम्हे करवाया था, पर तुम्हे जानते नहीं थे। तुम सब ने पाठशाला में आकर इन्हे पहचाना। ये कागज, ये कलम और ये कम्प्यूटर इन्हीं अक्षरो के कारण है।

          तुम नहीं जानते कि मैं ही तुम्हारे अन्दर उपस्थित हॅू। मेरे द्वारा पढ़ाये गये हर विद्यार्थी में मैं ही बीज रूप स्थापित हुआ और पल्लवित हो रहा हॅू। तुम सब मिट्टी हो और मैं बीज हॅू, जो तुम्हारे द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी जिन्दा रहॅूगा।

          वह अनन्त तुम्हारे अन्दर उपस्थ्ति था पर तुम उसे जानते नहीं थे। शिक्षक ने ही तुम्हारा उससे परिचय करवाया। शिक्षक ने ब्रम्ह्ना बनकर तुम्हारे अन्दर ज्ञान की सृष्टि की, विष्णु         बन कर उस ज्ञान की रक्षा की एवं महेश्वर बन कर तुम्हारे अज्ञान को नष्ट करते रहे। संस्कृत में सही ही कहा है

                             गुरो्बृम्हा, गुरोर,विष्णु, गुरोर, देवो महेश्वर।

                             गुरोर् साक्षात पर ब्रह्नम, तस्मै श्री गुरवे नमः।

          तुम तुम्हारे अन्दर के गुरू को जिन्दा रखना। जब तक तुम तुम्हारे अन्दर के गुरू को जिन्दा रखते हो तब तक तुम राम बने रहते हो। जब तुम उन्हें मार देते हो तब रावण बन जाते हो। तुम्हारे अन्दर उपस्थित तुम्हारी आत्मा ही तुम्हारा गुरू है। उसे जिन्दा रखो। उसी के प्रकाश में चलते रहो। अपने अन्दर की आत्मा में से को मत मरने देना। वही आत्मा है, वही गुरू है, वही तुम हो। ताल्वम्असि। अनन्त का हटाओगे तो उसका अन्त हो जायेगा। सबसे पहले सिखाये हुये उस एक को जिन्दा रखना। अगर उसे हटा दिय तो सारी संख्यायें मर जायेंगी। एक  है तो अनेक है। वह एक ही तुम्हारा गुरू है।

 

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