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वर्ष: 1, अंक 2,  सितम्बर, 2016

धूप चढ़ने लगी

 

चढ़ने लगी

धूप सुनहरी

सुबह की

पहाड़ों पर,

जगमगाने लगे खेत

नदियाँ प्रफुल्लित

पंछी

मस्तमौला घास

लहराने लगी

जैसे गीत गाती

सावन के I

उधर

मेड़ों पर

जमी बैठी

झाड़

मुस्काती मंद मंद

जैसे पा लिया कुछ,

और खड़ी

स्तम्भ सी

करती बातें मन ही मन I

 

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