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वर्ष: 1, अंक 2,  सितम्बर, 2016

बड़प्पन

 

गर रौंदने देती है ज़मीं
अपनी छाती को क़दमों तले,
गलती न कर समझने की
कमज़ोर मज़बूर इसे।
जब टूटता है सब्र इसका,
क्या होता है हश्र,
चश्मदीद तू भी है ,
चश्मदीद मैं भी हूँ।

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