Sahityasudha view
साहित्यकारों की वेबपत्रिका
मुखपृष्ठ


साहित्यकारों की रचना स्थली

वर्ष: 1, अंक 2,  सितम्बर, 2016

बकरा    

                        

नहीं समझता  बकरा

मायने रिश्तों नातों के

सगा सम्बन्धी , माँ , बहन चाची , ताई

और यहाँ तक कि बेटी भी नहीं जनता वह

उसके लिए ये सब हैं

विपरीत लिंग

 

उसकी ज्ञानेन्द्रियाँ

नहीं हुई विकसित

देखते ही विपरीत लिंग

लपलपाने लगती है उसकी जीभ

फड़फड़ाने लगते हैं होंठ और उत्तेजित हो उठता है

उसका अंग अंग ...

 

घुटनों से मुड़ कर उठ जाते हैं उसके

अगले दोनों नन्हें खुर

उसकी मर्जी के विरुद्ध

रचता है षड्यंत्र उसका रोम रोम

 

शायद वह जानता है अपनी अल्प आयु

अकाल मौत

जो निश्चित मगर अनिश्चित है

इसी लिए नहीं रोकती उसे उसकी

माँ बहन और बेटी

 

लेकिन ए पुरुष !

ए विश्वगुरु भारत !

प्राणी जगत में सर्वोत्तम समाज के

उत्तम पुष्प

तुम भी !...

 

 

 

www.000webhost.com