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वर्ष: 1, अंक 3, 14 सितम्बर, 2016

हिंदी दिवस विशेषांक


व्यंग्य


राजेन्द्र वर्मा


कछुआ और खरगोश

- राजेन्द्र वर्मा

देश को आज़ाद हुए कई दशक बीत चुके थे। कछुए और खरगोश के पूर्वजों की लगन और काहिली की कथाएँ लगातार दुहराये जाने के बावजूद उनमें अभी समरसता बनी हुई थी। इसका कारण श्रेष्ठ जन अपने देश का संविधान के मौलिक अधिकारों का समान रूप से लागू नहीं होना बताते हैं।... आम जनता को छोड़ सारी दुनिया को पता है कि अपने देश का संविधान इतिहास-भूगोल की तरह लचीला और कठोर, दोनों है। इसके एक हाथ में फूल है, तो दूसरे में पत्थर! कब किस पर क्या बरसाना है- इसे बख़ूबी मालूम है।

            ऐसे ही संविधान द्वारा गारंटीड समानता के अधिकारके चलते कछुआ और खरगोश साथ-साथ खेलते-कूदते और पढ़ने जाते। गाँव के स्कूल और क़स्बे के कालेज में नियमित रूप से खेलते-कूदते दोनों जीवन के इक्कीसवें वर्ष में प्रवेश करते हुए बी.ए. पास  हो गये। क़स्बे के कॉलेज में बी.एस-सी. अथवा बी.कॉम. था नहीं, अन्यथा वे उसे ही पास कर लेते!

            जैसा कि अब तक का दस्तूर रहा है कि बी.ए. वगैरह कर लेने के बाद आदमी एक क़लमघिस्सू नौकरी के अलावा किसी काम के लायक़ नहीं रह जाता, कछुआ और खरगोश भी नौकरी के अलावा किसी काम के न रहे। उनसे बहस चाहे जितनी करवा लो, लेकिन जब भूख लगेगी, तो वे अपनी-अपनी माता का ही मुख ताकेंगे! माता तो माता, पिता भी इस स्थिति में असहाय था। आख़िर दोनों ने मिलकर पढ़ने-लिखने लायक़ पुत्रों को पैदा किया था- उसका कुछ तो सिला उन्हें मिलना चाहिए था! इसलिए वे प्रसन्नतापूर्वक उन पर अपना ख़ून-पसीना लुटाने के लिए विवश थे।

            नौकरी पाने के लिए, जैसा कि चलन है, प्रोग्रेसिव रिश्तेदारों और श्रेष्ठटीचर के सुझावों पर अमल किया जाता है। इसलिए, कछुआ और खरगोश ने पहला क़दम यह उठाया कि दोनों अपने गाँव को उसके हाल पर छोड़ शहर आ गये। शहर आकर पहले उन्होंने किराये पर एक खोलीनुमा कमरा लिया और उसमें स्वास्थ्यपूर्वक रहने लगे।... खिचड़ी बना-खाकर वे नियमित रूप से ‘दैनिक जागरण’ का प्रतिदिन और रोजगार समाचारका साप्ताहिक आदि-अन्त करने लगे।

            खरगोश की माँ चाहती थी कि वह अपने किसी रिश्तेदार के साथ रहे, मगर कछुए की दोस्ती के कारण उसने रिश्तेदारी की ओर मुँह न किया।... दोस्ती का आलम यह था कि दोनों साथ-साथ नौकरी की तैयारी करते, साथ-साथ सिनेमा देखते और साथ-साथ कनखियों से कुँवारी कन्याएँ देखते।... कुछ कन्याएँ खरगोश को तो भाव देतीं, लेकिन कछुए की ओर देखती तक न थीं।... इससे कछुआ हतोत्साहित हो जाता, लेकिन एक अच्छे दोस्त की हैसियत से खरगोश उसे धैर्य बँधाता- “यार! कोई तो कछुवी होगी तेरी- एक दिन वह तुझे अवश्य मिलेगी!” दोस्त की बात सुन कछुए के चेहरे पर मुस्कान तैर जाती।...

            इसी प्रकार दो-ढाई साल वे दिन दूनी और रात चौगुनीकरते रहे, पर नौकरी न मिलनी थी, न मिली!... नौकरी मिलना कोई आसान है क्या? आसान होता तो, सभी नौकरी न कर रहे होते, कोई घास क्यों खोदता?

            नौकरी न मिलने के कारणों की जाँच की गयी, तो पाया गया कि दोनों ने बी.ए. की साधारण डिग्री हासिल की थी- बी.टेक्. बी.बी.ए., एलएल.बी., होटेल मैनेजमेंट जैसी रोज़गारपरक डिग्री नहीं! इधर-उधर हाथ-पाँव मारने पर  सेक्यूरिटी गार्ड की नौकरी ज़रूर मिल रही थी, पर उसे कोमलांग खरगोश कैसे करता? इसलिए दोस्ती का परचम ऊँचा रखते हुए कछुए ने भी उस पर लात मार दी।... नौकरी के नाम पर तैयारी करने वाली अवधि में थोड़ी-बहुत मटरगश्ती करने के बाद दोनों दोस्त गाँव वापस आ गये।

            कछुए के साथ खरगोश की दोस्ती किसी को पसन्द नहीं आ रही थी। एक प्रकृति-प्रदत्त बात भी आपस में भेद करने वाली थी- कछुआ मेहनती ख़ानदान से था और खरगोश चंट से! एक जमीन में धँसा हुआ, तो दूसरा आसमान नापने को कुलांचें भरता हुआ! एक के घरवाले और रिश्तेदार अनपढ़, मेहनकश और ग़रीब, जबकि दूसरे के पढ़े-लिखे, आरामतलब और अमीर! फिर भी दोनों की दोस्ती में कोई दरार न आयी।...

            कछुआ अक्सर खरगोश के घर पर रह जाता, क्योंकि उसका घर बड़ा था। घर में केवल दो ही प्राणी थे- माँ और बाप। उधर, कछुए के घर पर ख़ासी भीड़। जरा सी खोली और उसमें पाँच-पाँच प्राणी! मां-बाप, एक बड़ी बहन, एक छोटा भाई और वे स्वयं!... मीट-मछली की बदबू कि पूछो मत! कछुआ स्वयं तो निरामिषभोजी था, पर माँ-बाप और भाई-बहन पर उसका कोई ज़ोर न था। वह समझाता- ‘‘कुछ ढंग से रहना सीखो। मेरे दोस्त से ही कुछ सीखो- देखो,  कैसा सजा-सँवरा रहता है!’’

        घरवाले दो टूक जवाब दे देते- ‘‘अरे रहै द्यो, हम, हम हैं और वे, वे!... चार किताबै का पढ़ लेहो हौ, तौ का खरगोश हुई जइहौ?’’

            कछुआ मन मार कर रह जाता।

       उधर, खरगोश के माता-पिता बेटे की कछुए की दोस्ती से परेशान रहते- ख़ास तौर पर जब आये दिन कछुआ उनके घर पर ही रह जाता। रिश्तेदारों से परमपिता की शिकायत करते- ‘‘भगवान ने कैसा बेटा दिया है कि उसने दोस्ती भी की, तो कछुए से! भला बताओ कछुए से कोई निभाये भी, तो कैसे? न रंग-रूप, न क़द-काठी, न कोई गुण! मन तो करता है कि इस कलूटे को चिमटे से मार-मार कर भगा दूँ, लेकिन इकलौते बेटे का ख़याल आ जाता है- पता नहीं क्या कर बैठे?’’

 

            समय उसी प्रकार बीत रहा था, जैसे शपथ लेने के बाद मुख्यमंत्री का बीतता है। पाँच साल ऐसे बीत जाते हैं जैसे पाँच महीने! साल का कार्यक्रम लागू नहीं हो पाता कि अगला साल आ जाता है।... अब क्या घरवाली को जवाब दें और क्या जनता को?  

            कछुआ और खरगोश ने कम-से-कम तीन साल शहर में रहकर नौकरी की तैयारी का लक्ष्य रखा था, पर दो ही सालों में वे थक-हार कर गाँव वापस आ गये।... खरगोश पर दबाव था कि वह अकेले ही शहर जाए और अपने मौसा जी से घर पर रहे। वे सचिवालय में अंडर सेक्रेटरी थे। लेकिन खरगोश इसके लिए राज़ी न हुआ। उसने शर्त रखी कि वह शहर इसी शर्त पर जाएगा जब कछुआ भी साथ चले!...कछुए के घरवाले कहते थे कि अब उनके बस का नहीं कि वे कछुए को शहर में रख सकें। वहां रहना हो, तो अपने दम पर वह रहे! लेकिन, कछुआ अपने दम पर शहर जाने और वहां रहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया, हालांकि खरगोश ने पर्याप्त सहायता का आश्वासन दिया था। परिणाम यह हुआ कि न कछुआ शहर गया और न ही खरगोश!

            दोनों को शहर से लौटे हुए साल बीत रहा था।... अचानक खरगोश की क़िस्मत ने पलटा खाया।

            हुआ यह कि एक दिन खरगोश के मौसाजी सपरिवार टवेरासे खरगोश के घर पधारे।... उस समय कछुआ वहीँ था। नाश्ता-पानी की व्यवस्था हुई। उसने भी हाथ बँटाया, पर मौसीजी और उनकी बच्चों के बीच कछुआ अलग-थलग पड़ गया। वह अपने घर जाना चाहता था, पर खरगोश ने उसे नहीं जाने  दिया।... डायनिंग टेबिल पर जब कछुआ भी बैठा, तो मौसीजी नाराज हो गयीं। उठकर कमरे में चली गयीं, कहा- ‘‘खाना यहीं भिजवा दो। वे किसी कछुए के साथ नहीं खा सकतीं!’’

            जब कछुए को इस बारे में पता चला, तो वह डाइनिंग टेबल से उठने लगा, पर खरगोश ने उसे नहीं उठने दिया। उलटे मम्मी की ओर कुछ ऐसे देखा कि जैसे कह रहा हो, यदि कछुआ नहीं बैठेगा, तो वह भी नहीं बैठेगा! लेकिन खरगोश की मित्र की पक्षधरता कुछ काम न आयी और देखते-ही-देखते, मम्मीजी भी मौसी के साथ कमरे में चली गयीं!

            मौसाजी ने मौसी को समझाने की कोशिश की, “ज़माना बदल रहा है। अब कछुआ और खरगोश हर जगह साथ-साथ रहते हैं- वह चाहे घर हो या दफ्तर! रेल हो या बस! और तो और, एरोप्लेन में भी दोनों साथ-साथ सफ़र करते हैं, इसलिए अब इनको साथ लेकर चलना सीखो।... ज़्यादा मुँह मत बिचकाओ!”, पर मौसीजी ने उनका प्रवचन अनसुना कर दिया।... दोनों बहनों ने कमरे में ही खाना खाया। कछुआ, खरगोश, उसके पापा और मौसाजी ने डाइनिंग टेबल पर साथ-साथ खाया।

            सचिवालय में दो एल.डी.सी की दो जगहें खाली हुईं- एक रिटायरमेंट से और एक पदोन्नति से। मौसाजी का पुत्र भी अभी तक बेरोज़गार था। उसका मन पढ़ने-लिखने में बिलकुल नहीं लगता था।... किसी तरह इंटर पास हो सका था। वह भी तब, जब मौसाजी ने शिक्षा विभाग के अनु सचिव से कहकर बोर्ड के एक अधिकारी के घर पर पुत्र महोदय से कापी लिखवाने की व्यवस्था करा दी।... अधिकारी को उम्मीद थी कि जब नक़ल में कोई बाधा न थी, तो फर्स्ट डिवीज़न आनी चाहिए थी, इसलिए उसने एग्ज़ामिनर को नम्बर बढ़ाने के लिए नहीं कहा। लेकिन, नतीज़े से परीक्षार्थी के अलावा सभी प्रबन्धकर्ता हैरान थे।  थर्ड डिवीजन आयी थी। बस, तसल्ली की बात यह थी कि परीक्षार्थी  फ़ेल नहीं हुआ और आइन्दा ऐसे झंझट से सब लोग बच गये!

            दो पदों में से एक के लिए मौसाजी का पुत्र सशक्त उम्मीदवार था। दूसरी जगह के लिए उन्होंने साढ़ू महोदय के सुपुत्र के लिए बात कर रखी थी।

            न्योक्ता का कहना था- ‘‘यार! तू मेरे दस लाख का ख़ून क्यों करना चाहता है?’’

            मौसाजी ने कहा- ‘‘हरामी! तुझे अपने बेटे का हिस्सा छोड़ने को कह रहा हूँ, दूसरी पोस्ट को क़ुर्बान करने को नहीं!... तेरे दस लाख तो सुरक्षित ही हैं।’’

            - अमां कहा यार! दो जगहों के लिए वो साला मुख्यमंत्री का पी.ए. मुझसे दस लाख हगा लेगा! मुझे क्या बचेगा?  कद्दू! ... जब दोनों के बीस मिलते,  तभी तो दस बचते!

            - उससे कह देना,  एक की जगह तो मेरा ही बेटा है। मैंने उसके दसियों काम बिना पैसे नहीं किये क्या?

            - तो भी,  साला पाँच से कम में तो न मानेगा!

            - जो भी हो,  मैं तुझे दस तो दिलवा ही दूँगा।

            - चलो,  देखते हैं!

       दोनों पद रोज़गार समाचारमें प्रकाशित हुए। डेढ़ सौ एप्लीकेशन्स आयीं। कछुआ और खरगोश भी इनमें शामिल थे। खरगोश को नहीं मालूम था कि उसके लिए एक पद खरीदा जा चुका है, इसलिए वह कछुए के साथ जमकर तैयारी करने लगा।... सामान्य ज्ञान, पत्राचार विधि, अंकगणित के सामान्य प्रश्न, देश का इतिहास-भूगोल; लगभग सभी प्रश्न लिखित और मौखिक रूप से तैयार हो गये। हमेशा की तरह कछुआ खरगोश से आगे था।...

            एक-से-एक उम्मीदवार! कोई डबल एम.ए., कोई एलएल.बी., कोई एम.बी.ए, कोई बी.टेक्। इंटर-बी.ए. वाले तो उनके आगे जैसे बच्चे! लेकिन जब भगवान मदद करने पर उतारू हो, तो इंटर-बी.ए. वालों का काम बनने में कौन अड़चन डाल सकता है?... प्रक्रिया पूरी हुई और जब न्योक्ता के पास पन्द्रह लाख के एक-एक हज़ार के करारे नोट पहुँच गये, तो नियुक्ति पत्र निर्गत हो गये- पहले मौसाजी के सुपुत्र को, फिर उनके साढ़ू भाई के पुत्र को।... साढ़ू भाई को इस अदने से काग़ज़ के लिए बारह लाख रुपये खर्च करने पड़े जिसके लिए उन्हें गाँव से सटे खेत का आधा टुकड़ा आठ लाख रुपये में बेचना पड़ा। उसे यदि आराम से बेचा जाता,  तो कम-से-कम दस लाख तो मिलते ही!

 

            नौकरी के परिणाम पर कछुए की आँखों में निराशा के आँसू आ गये। उसे हैरत थी कि खरगोश मियां कैसे बाजी मार ले गये, जबकि पेपर और इंटरव्यू,  दोनों ही उसके अच्छे हुए थे।

            यह तो अच्छा ही हुआ कि कछुए या उसके घरवालों को इस डील का पता नहीं चला, अन्यथा उनके तो प्राण ही सूख जाते! उनके पास ज़मीन भी कहाँ थी कि जिसे बेचकर आगे कोई ऐसी गणित बिठायी जा सके!...

        खरगोश को भी ताज्जुब हुआ कि कछुए के मुकाबले उसे कैसे नौकरी मिल गयी! पर जब किसी को नौकरी मिल जाती है, तब वह स्वयं को औरों से अलग समझने लगता है। उसे लगने लगता है कि अब तक वह ख़ुद तो अंडरएस्टीमेट कर रहा था, जबकि उसके भीतर कुछ अवश्य था जो उसके साथियों में नहीं था। खरगोश ने भी इस सुखद अवसर को इसी समीकरण के अनुसार एन्जॉय किया। 

            कछुए के असफल रहने की वज़ह तो वह भी नहीं समझ पा रहा था, पर अब क्या हो सकता था। भरपूर  अफ़सोस ज़ाहिर करने के बाद खरगोश नौकरी पर शहर चला गया।

            जब नौकरी के दो-तीन महीने बीत गये, तो एक दिन खरगोश को पता चल गया कि उसके लिए बारह लाख की नौकरी खरीदी गयी है, जिसमें से दो लाख मौसाजी ने कमीशन भी खा लिया है। पूरा प्रकरण जानकार उसे अपने पिता और मौसाजी, दोनों से जैसे घृणा हो गयी।... आँखों के आगे जब कभी कछुए की तस्वीर घूम जाती, उसे नौकरी ही न भाती, पर यह आवेश थोड़ी देर में ठंडा पड़ जाता! 

            जल्द-ही खरगोश ने मौसा जी का घर छोड़ दिया। दूसरे मोहल्ले में किराए पर कमरा ले लिया। कछुए ही हालत पर उसे तरस आ रहा था, पर मारे शर्मिंदगी के वह उसे सचाई बताने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था।... फिर उसने सोचा, ‘चलो, जो हुआ, सो हुआ, मगर कछुए की भी नौकरी की व्यवस्था की जानी चाहिए! उसने अपने कलीगों, और एकाध बड़े अधिकारियों से कछुए की नौकरी के लिए बात की। पर, बात बनना तो दूर, कहीं से कोई आश्वासन भी नहीं मिला!... एकाध लोगों ने पाँच लाख में चपरासी की भरती करवाने की बात कही, लेकिन पैसों की व्यवस्था कैसे होती? उसने प्रस्ताव किया कि नौकरी लग जाने पर पाँच क्या छः लाख का भुगतान महीने की तीन-चौथाई तनख्वाह से हो जायेगा, लेकिन रिश्वत कौन उधार रखता है! ख़ास तौर पर जब लोग एडवांस हथेली पर रखे घूम रहे हैं!...  कुछ दिनों तक खरगोश लगा रहा कि कुछ बात बन जाए, पर बात न बननी थी, न बनी।

            समुद्र अथवा उसके आस-पास के क्षेत्रों को छोड़ अन्यत्र मेघों से बूँद की आस करना जहाँ नादानी माना जाता हो, वहाँ खरगोश द्वारा कछुए की मदद को कौन सहायक होता? थोड़ी-बहुत कोशिश के बाद खरगोश ने भी इस विषय पर सोचना छोड़ दिया। 

 

            पता नहीं कहाँ से गाँव भर में ख़बर फैल गयी है कि खरगोश के लिए नौकरी खरीदी गयी है। ज़मीन बिकने पर गाँव वाले यह अटकल लगा रहे थे कि खरगोश के पिताजी शहर में प्लाट खरीदने जा रहे हैं। लेकिन जब प्लाट खरीदने की बात घर से ही नहीं पक्की हुई, तो उस पर कौन यक़ीन करता! गाँव का कोई आदमी जब शहर में बस जाता है, तो गाँव में ईर्ष्या और लालच अपने पाँव पसारने लगते हैं।

            ईर्ष्यालु लोग न हों तो, उन्नति का क्रम भंग हो जाए! इससे अन्य लोगों को गज़ब की प्रेरणा मिलती है। ईर्ष्या का खूबसूरत नाम है- प्रेरणा! आप प्रेरणा के शिकार हो अथवा ईर्ष्या के, उन्नति आपकी ही होती है। ख़ुशी वाले मामले कम पाए जाते हैं, क्योंकि लोग अपनी ही बढ़त चाहते हैं। इसके लिए दूसरों की अवनति अथवा उनकी आर्थिक गति में ठहराव का होना आवश्यक है।...

            लालची लोगों की वज़ह से भी दुनिया तरक्की करती है। लालच स्वार्थ सिद्ध करने का आश्वासन देता है, क्योंकि अगर पडोसी के पास गाड़ी होगी, तो दूसरे पड़ोसी को यह आशा रहेगी कि वक़्त-ज़रुरत गाड़ी उसके काम आएगी, हालाँकि ऐसा वक़्त आता देखा नहीं जाता- बस बातों में उसका ज़िक्र किया जाता है। दुनिया में तमाम सिद्धांत इसलिए ही प्रचलित है, क्योंकि उन्हें लिखा-पढ़ी में सुरक्षित रखा जाता है। केवल व्यवहार पर आश्रित रहेंगे, तो इनका कब रामनाम सत्य हो जाएगा- कौन जानता है!...       

            जब कछुए को पता चला कि खरगोश के लिए नौकरी खरीदी गयी है, तो उसे खरगोश पर बहुत ग़ुस्सा आया। लेकिन ग़ुस्सा तो उन सबों को आया होगा, जिनकी नौकरी नहीं लगी। तो क्या जिनकी नौकरी नहीं लगी है, वे उनके दुश्मन हो जाएँ जिनकी नौकरी लग गयी है!... अगर ऐसा होने लगे, तो दुनिया में केवल दुश्मनी का ही रिश्ता बचे!... ऐसा कहीं होता है भला!...फिर इसमें बेचारे खरगोश की क्या ग़लती? कछुए से खरगोश की ग़लती मानी न गयी।

            हालाँकि नौकरी की तैयारी में अब कछुए का मन तो नहीं लग रहा था, लेकिन विकल्प भी क्या था? कोई क़िस्मत का लेखा शिरोधार्य न करे, तो क्या करे? वैसे भी क़िस्मत का लेखा सदैव मान लेने के लिए ही लिखा जाता है! वह भले ही ख़राब नतीज़ा दे!  

            मन को समझा-बुझाकर कछुआ भविष्य में निकलने वाले पदों के लिए नये सिरे से तैयारी में जुट गया।...

            कछुए के पिता को तसल्ली थी खरगोश का साथ छूटा! उसके साथ रहकर लड़का हाथ से निकला जा रहा था!... अब ठीक है। नौकरी मिल गयी तो अच्छा, वरना गाँव में ही कुछ काम-धाम करेगा!... कुछ नहीं होगा तो मनरेगातो है ही। साल के तीन-चार महीने तो आराम से कट जायेंगे!

            भाई-बहन को तसल्ली थी कि उनका भाई बिरादरी से बाहर नहीं गया। माँ तो शुरू से ही कहती थी- ‘‘हम लोगों की क़िस्मत में नौकरी कहाँ! सालोभर मजदूरी का बानक बना रहे,  यही बहुत है!’’

       बहुत दिनों बाद कुछ जगहें निकली हैं। कछुआ फॅार्म भरने शहर जा रहा है।.... फॉर्म जमा करने के बाद वह अपने दोस्त,  खरगोश से मिलेगा- शायद कुछ जुगाड़ कर दे!.. दोस्त भी अगर दोस्त के काम न आएगा, तो कौन आयेगा?


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