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वर्ष: 1, अंक 3, 14 सितम्बर, 2016

हिंदी दिवस विशेषांक


लेख


संजय वर्मा


गीतों को अमरता

-संजय वर्मा

गीत शब्दों की कल्पना,राग,संगीत के साथ गायन  की मधुरता  कानो  में मिश्री घोलती  साथ ही साथ मन को प्रभावित भी करती है | गीतों का इतिहास भी काफी पुराना है | रागों के जरिए दीप का जलना, मेघ का बरसना आदि किवदंतियां प्रचलित रही है ,वही गीतों के जरिए राग व घराने भी बने है

 

गीतों का चलन तो आज भी है जिसके बिना फिल्में अधूरी सी लगती है | टी वी ,रेडियों ,सीडी ,मोबाइल आइपॉड आदि अधूरे ही है | पहले गावं की चौपाल पर कंधे पर रेडियो टांगे लोग घूमते थे | घरों में महत्वपूर्ण  स्थान होता  ठीक वैसे ही रेडियों को भी दर्जा प्राप्त था | कुछ घरों में टेबल पर या घर के आलीए में कपड़ा बिछाकर उस पर रेडियों फिर रेडियों के ऊपर भी कपड़ा ढकते थे जिस पर कशीदाकारी भी रहती थी | बिनाका -सिबाका गीत माला के श्रोता लोग दीवाने थे | रेडियों पर फरमाइश गीतों की दीवानगी होती जिससे कई प्रेमी -प्रेमिकाओं के प्रेम के  तार आपस में जुड़ जाते थे |वो  गीतों में इतने भावुक हो जाते थे की वे अपने आप को हीरो -हीरोइन समझने लगते |

 

            दूर कहीं रेडियो  पर सुनसान माहौल में बजता  गीत वाकई कानों  में मधुर रस आज भी घोल जाता है । रेडियो का चलन बीच में कम   हुआ था किन्तु रेडियो ने अपने अनेक दोस्त बना  लिए जैसे रेडियों मिर्ची  आदि । क्रिकेट मैच को टीवी पर देखते समय लाइट चले जाने पर कमेंट्री सुनने का एक मात्र  सस्ता साधन रेडियों है ।सहित्य ,गायन कृषि ,वार्ता आदि के लिए कलाकारों को आमंत्रित किया जाता रहा है । रेडियो पर बजने वाले गीत अब मोबाईल के संग जेबों में जा घुसे ,गीतों में प्रतिस्पर्धा होने लगी । हर चैनल पर गायकों की प्रतियोगिता में अंक मिलने लगे । निर्णायकों  की डॉट पढ़ने और समझाईश  की टीप  प्राप्त होने लगी । जिससे प्रतिभागियों के चेहरे पर उतार चढाव झलकने लगा । 

 

पृथ्वी पर देखा जाये तो गीतों को अमरता प्राप्त है । पृथ्वी पर कोई भी ऐसा देश नहीं है जहाँ गीतों का चलन न हो । वैज्ञानिकों ने गीतों को ब्रम्हांड में भी प्रेषित किया है ताकि बाहरी दुनिया के लोग इस संकेत को पकड़ सके । शादी -ब्याह  में वाद्य यंत्रों के साथ गीत गाने का चलन बढ़ने लगा है । गीतों  की पसंदगी व् हिस्सेदारी में पडोसी देश भी आगे आये है । पहले के ज़माने में बच्चे -बूढ़े सभी अंतराक्षरी खेल कर अपने गायन कला  का परिचय करवाने के साथ ही जीतने व् ज्यादा गानों को याद रखने की कला को  बखूबी जानते थे। 

 

वर्तमान  में बढ़ती महंगाई. ,हिंसा ,बलात्कार ,भ्रष्टाचार दहेज़ प्रथा ,समस्याओं  आदि से दुखी लोग समस्यों के समाधान हेतु अपना  राग  अलाप ही रहे है मगर समस्यायों  के गीतों को सुने जाने के प्रति ध्यान कम ही  है । गीतों में भी मधुरता जब ही प्राप्त होगी जब उनकी समस्याओं का त्वरित हल होगा । दिमाग में टेंशन और होने से गीत के बोल कर्ण  प्रिय होने के बावजूद कर्ण  प्रिय नहीं लगते है ।  रेडियो ,टीवी पर 'मन की बात" ही  ऊर्जा भर सकती है तभी रेडियों में बजता  गीत- "कोई लौटा दे मेरे बीते  हुए दिन  .. "से मानो ऐसा लगता है की रेडियों की बहारे फिर से और ज्यादा  खिलने लगी । हर इंसान गुनगुनाने लगा। आकाशवाणीया होने लगी । मानो समाधान होने वाला है । 

 


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