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वर्ष: 1, अंक 3, 14 सितम्बर, 2016

हिंदी दिवस विशेषांक


लेख


रवि शंकर प्रसाद


खेल

-       रवि शंकर प्रसाद

 

खेल मनुष्य का एक स्वाभाविक गुण है l खेल वह है जो मान्य नियम के अनुसार  एक लक्ष्य  के लिए सानन्द खेल जाता है l इन सब की स्वाभाविक प्रेरणा हमारे अंदर स्वतः जागृत होती है

खेलना मनुष्य का प्रकृति गुण है l मगर आज का सभ्य समाज बच्चों को खेलने से रोक रहा है l बड़े अक्सर बच्चों को यह कहते हुए रोक देते हैं "खेलोगे तो चोट लग जाएगी l  खेलोगे तो लड़ाई हो जाएगी l  खेलोगे तो समय बर्बाद हो जायेगा l "  लेकिन इन समझदार लोगों को नहीं मालूम की इस नसीहत से वे बच्चों का नुकसान कर रहे हैं l  उन्हें खेल से होनेवाले फायदे से वंचित कर रहे हैं l जो नहीं खेलते हैं उन्ही का  शरीर बेडौल,कमजोर और बीमार हो जाता है

खेल न खेलकर जो समय और पैसा उसने बचाया होता है वो जिम में या हॉस्पिटल में देना पड़ता है

खेल से शरीरी ही नहीं बल्कि  मानसिक विकास भी होता है l खेल हमे हारना सिखाता है l खेल से ही हम हार को स्वीकारना , अपनी कमी को सुधारना और फिर जीत का प्रयास करना सीखते  है l खेल हमे जीतना सिखाता है l खेल हमे सिखाता है की जीत अकेले खेलने से नहीं होती है l  जीत का मतलब घमंड करना नहीं होता है l  जीत निरंतर प्रयास से होती है l खेल हमारे अंदर प्रतियोगी की भावना पैदा करता है l खेल से ही हम सिखाते हैं की कैसे दूसरों से आगे स्वस्थ तरीकों से रहा जा सकता है

खेल हमारे अंदर की शक्तियों को, मन और शरीर की शक्तियों को केंद्रित करता है l  उसे एक सकारात्मक दिशा देता है l इसीलिए जब भी हम खेलते हैं हमे तुरंत अनुभव होता है कि हमारे अंदर चिंता या निराशा की भावना नहीं है l हमारे अंदर कुछ कर गुजरने  की इच्छा जग जाती है

खेल हमेशा अनुशाशन में रह कर ही खेल जाता है l  यह अनुशाशन का अभ्यास मनुष्य को व्यक्तिगत और सामाजिक दोनों क्षेत्र में बहुत काम आता है

खेल हमारे अंदर सामाजिक गुण का विकास करता है l जो जितना बड़ा खिलाडी होता है वह उतना बड़ा सामाजिक व्यक्ति होता है l  उसे समाज में अपनी भूमिका पता होता है  और समाज को कैसे एक सही दिशा देना है यह पता होता है l  ये गुण केवल इसलिए हमारे अंदर आ जाते  है क्योंकि खेल कभी भी हम अकेला नहीं खेलते हैं l  हम जब टीम में होते हैं तो टीम की भावना से खेलते हैं l टीम भावना के अभाव में अच्छा खिलाडी भी हार जाता है और टीम भावना से खेलने पर बुरा खिलाडी भी जीत जाता है

खेल हमे दुश्मनी करने के अंदाज़ सिखाता है l  जब भी हम खेलते हैं तो हमारे सामने दुश्मन के रूप में  कोई खिलाडी रहता है हम उसे तभी हरा पाते हैं जब उस खिलाडी को हम अपने से कम नहीं आंकते हैं और उसकी गलतियों से हम सिखते हैं l  अगर कभी वो जीत भी जाता है तो हम उसकी जीत को चुनौती के रूप में लेते है और उसे हराते हैं

कभी भी जीतकर हमारे अंदर घमंड नहीं आता है और हार कर हम स्वयं को कमजोर नहीं मानते हैं l  क्योंकि हमारी आज की जीत कल  हार भी हो सकती है l  आज की हार हमे ये बताती है की कमजोर हम नहीं थे बल्कि  हमारी तैयारी कमजोर थी

खेल से हम जीतना कुछ व्यवहारिक रूप से तुरंत सीखते हैं उतना हम कभी भी किताब पढ़कर , स्कूल जाकर या किसी उपदेशक के उपदेश सुनकर नहीं सिख सकते हैं l  इसलिए खेल हवा , पानी  और भोजन के बाद सबसे आवश्यक चीज है l  शायद यही वजह है की मोटी मोटी किताब पढ़कर भी आदमी संतुलित जीवन नहीं जी सका जबकि बचपन में धूल मिटटी में खेलनेवाला व्यक्ति एक खुशनुमा और संतुष्ट ज़िन्दगी जी लेता है

 पहले लोग कहते थे "पढोगे लिखोगे बनोगे नवाब , खेलोगे कूदोगे होंगे ख़राब "l  आज वही लोग कहते हैं "खेलना जरुरी है"  क्यों ? क्योंकि इसमें पैसा है l  ये भी गलत है l  इस सोच की वजह से खेल खेल नहीं बल्कि खिलाडी के लिए एक काम हो गया है और जो खेलाने का काम करते है उनके लिए व्यवसाय हो गया है l  दिन प्रति दिन खेल से खेल की भावना मरती जा रही है l  उसकी जगह तनाव और चिंता पैदा हो रही है

आज खेल घरो और मैदानों में नहीं होता है l पैसा खर्च करके यह स्पोर्ट्स क्लब्स और टी.वी. पर होता है l जबकि खेल देखने की नहीं खेलाने की चीज है l खेल का व्यवसायीकरण मनुष्य के स्व्भविक विकास का व्यवसायीकरण है l  हमे ऐसे रोकना चाहिए

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