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वर्ष: 1, अंक 3, 14 सितम्बर, 2016

हिंदी दिवस विशेषांक


लघुकथा


सरस दरबारी


बिन पानी सब सून ......

-       सरस दरबारी

आज बच्चे बहुत खुश थे. टीचर ने अनाउंस  किया  था की आज हम इतिहास के क्लास में तुम्हे एक दूसरे गृह पर ले जायेंगे . तुम लोग अपने आईपैड, अपने कंप्यूटर  अपने साथ रख लेना। बच्चे बहुत उत्साहित थे ।उन्हें एक यान पृथ्वी नामक गृह पर ले गया. सब तरफ धूल उड़ रही थी, पेड़ों का कहीं नामो निशान नहीं था.  बहुत कम लोग दिखायी दे रहे थे जो अपनी उम्र से कहीं ज़्यादा के प्रतीत हो रहे थे । उनके सर पर बाल,  चेहरे  पर भवें और पलकें नदारद थीं . सफाई के नाम पर रासायनिक तेल शरीर पर रगड़ वे तौलिया से पोछ लेते। औरतों के बाल  नहीं थे , क्योंकि उन्हें धोने के लिए के लिए पर्याप्त जल नहीं था. वहां खारे पानी को मीठा करने के कई कारखाने थे, जहाँ पानी बतौर तंख्वाह मिलता था। पानी के लिए लूटपाट, कत्लेआम आम बात थी। पानी सोने से ज़्यादा कीमती था जिसपर कडा पहरा रहता. पानी की कमी से शरीर झुलसे, और निर्जलित थे , वनों के न होने से , बारिश की भी कोई आशा नहीं थी। बच्चे यह नज़ारा देखकर बहुत दुखी हुए. फिर टीचर ने कहा अब अपने आईपैड खोलो और इस गृह को देखो , आज से 100 साल पहले यह कैसा  था. बच्चों ने जब सर्च किया तो दंग रह गए . हर तरफ ख़ूबसूरती और खुशहाली थी, समुंदर के किनारे बच्चे खेल रहे थे , ऊँची ऊँची लहरों के बीच तैर रहे थे , सुन्दर बाग़ बगीचे जहाँ बहुत खूबसूरत फूल  खिले थे , लोग कितने खुश दिखाई दे रहे थे , अपने सुन्दर बालों में औरतें कितनी खूबसूरत लग रही थीं , पानी में रंग बिरंगी मछलियाँ तैर रहीं थीं, पेड़ों की अनेक प्रजातियाँ थीं जिनपर असंख्य रंग बिरंगे फूल खिले हुए थे।  आसमानों में खूबसूरत परिंदे कलरव कर रहे थे । बच्चे अविश्वास से वह सब देख रहे थे. फिर एक ने पूछा , मम, यहाँ जब इतनी खुशहाली थी फिर इस गृह का यह हाल क्यों हो गया . मम ने समझाया , की जल जीवन के लिए हमेशा ही बहुत आवश्यक रहा है  और पृथ्वी पर बहुत जल था , पर इंसान खुदगर्ज़ हो गया , उसने लालच में अँधा होकर पृथ्वी के सारे नैसर्गिक रिसोर्सेज का दोहन शुरू  कर दिया , आवास बनाने के लिए वनों को काट दिया, जल की बर्बादी की, बहुत समझाने पर भी उसने पानी की कद्र नहीं की. और धीरे धीरे पृथ्वी से पानी ख़त्म हो गया. तभी एक बच्चे ने एक तस्वीर खोजी। देखिये मम, यह क्या है? टीचर ने बताया की इसे कुआं कहते हैं, बारिश का पानी इसमें भर जाता था और लोग इस्तेमाल करते थे। पर माम इतने सारे लोग एक साथ.......! माम ने तस्वीर देखकर कहा बच्चों जब लोगों ने पानी की कदर नहीं की तो एक दिन पानी पृथ्वी पर  खत्म होने लगा। लोग एक एक बूंद पानी के लिए तरसने लगे। कुएं सूख गए , जब इका दुक्का कुएं बचे तो लोग उनपर  टूट पड़ते ।  धीरे धीरे उनका पानी भी चुक गया और लोगों के पास दूसरे ग्रहों पर जाने का एक मात्र विकल्प रह गया । जो अमीर थे वे निकल गए , पर कुछ लोग यहीं पृथ्वी पर रह गए। हमारे पूर्वज भी इसी पृथ्वी से आये थे जो अब दूसरे गृह पर जाकर बस गए. अगर इंसान समय से चेत गया होता तो यह सबसे खूबसूरत गृह पृथ्वी इतना बदसूरत न होता. बच्चे वहां से लौट आये , पर मन पर वही चित्र अब भी अंकित  थे. समुन्दर के किनारे ऊँची ऊँची लहरों में गोते लगते बच्चे और बड़े , बागों में खूबसूरत फूलों के बीच खेलते बच्चे. जगह जगह टोलियों में बैठे खूबसूरत लोग, और पंछियों की चहचाहट और मन में एक अफसोस, “काश हमारे पूर्वजों ने पानी की कदर की होती तो आज हम भी यह सुख भोग रहे होते 

 


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