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वर्ष: 1, अंक 3, 14 सितम्बर, 2016

हिंदी दिवस विशेषांक


लघुकथा


मिर्ज़ा हाफिज़


पहली सीढ़ी पर

वे हस रहे हैं । हसे जारहे हैं… । उनकी बेढ़ंगी घमंडी मूछों के नीचे से झांकते गंदे दांत देख उसे मतली आने लगती है । इनके चेहरे उसे उसी एक चेहरे की याद दिलाते हैं …।

हां, ये सब चेहरे ही तो हैं । खाकी वर्दियों के ऊपर अटकाये हुये भिन्न-भिन्न प्रकार के चेहरे । बेहिस और बेदर्द चेहरे, जैसे खिलौनो की दुकान पर टंगे हुये मुखौटे । वे किस बात पर ठहाके लगा रहे हैं ? वह हैरान है । उसके आंसू थमने का नाम नही ले रहे ।

“क्या हो गया ? जीजा तो है तेरा ?”

वह बेबसी से देखती है ।

“साली तो आधी घरवाली होती है ।“

“कोई सबूत लाई है ?”

“टूटी चूड़ियाँ…”

“फ़टे कपड़े पहनकर नहीं आई ?”

“वो वीडियोक्लिप लायी है, जिससे ब्लैकमेल करता था ?”

“ज़रा हम भी तो देखें… , हम कैसे मान लें तू सच बोल रही है ?”

“तुझे शर्म नहीं आई अपनी बहन का घर खराब करते हुये । अब यहां बलात्कार की रिपोर्ट लिखाने चली आई है । तेरा जीजा जेल चला जायेगा तो तेरी बहन का क्या होगा ? सोंचा है… ?”

“अपने बाप का सोंच ।“

“अपने परिवार का सोंच ।“

सवाल ! सवाल !! सवाल !!! जितने चेहरे उतने सवाल । उतने उपदेश ! उतनी फ़टकार !

न्याय के मंदिर की पहली सीढ़ी पर बैठी वह रो रही है । न्याय के मंदिर के पहरेदार चेहरे विद्रूप से विकृत हुये जा रहे हैं । एक चेहरे को थोड़ी दया आती है, “ठीक है, चल छेड़-छाड़ की रिपोर्ट लिख लेते हैं, अभी रो मत…”

_मिर्ज़ा हफ़ीज़


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